अबकी बार कन्फ्युजिंग सरकार?


#1

इराक में चार-पाँच सौ विद्रोही धावा बोलते हैं और हजारों की फौज अपनी वर्दी उतारकर भागने लगती है, त्राहिमाम मच जाता है। कुछ ही दिन में वहाँतमाम धार्मिक इमारतों को धूल चटा दिया जाता है, हजारों मारे जाते हैं जिनमें से अधिकाँश एक ख़ास समुदाय के बताये जाते हैं जिनकी वहां सरकार है।

अब राष्ट्रवादी कहे जाने वाले लोगों को समझ में ही नहीं आ रहा है की इस फैसले का कैसे बचाव करें?

भारत में भी अनेक शहरों में विरोध प्रदर्शन शुरू होता है, बुर्कानशीं महिलाएं और बुजुर्गों से लेकर बच्चे तक मातम मनाते हैं लेकिन मीडिया खुद ही उनकी खबरों को सेंसर करता है, क्योंकि बहुत ही संवेदनशील मुद्दा है। विद्रोहियों का सरदार खुद को खलीफा घोषित कर देता है और दुनिया भर के मुसलामानों से अपील करता है की सब उसे अपना नेता मान लें। जाहिर है की उसकी तैयारी एक दो महीनों की रही नहीं है और इराक की ट्रेंड फौज को अनेक शहरों से खदेड़ने के पहले वह सीरिया में जबरदस्त लड़ाई लड़ चुका है, उधर आग लगाने के बाद वह इराक की तरफ बढ़ा है।

भारत सरकार इराक से भारतीय मजदूरों को निकालने की मुहीम शुरू करती है जिसके लिए रणनीतिकार खाड़ी में भेज दिए जाते हैं और तमाम मजदूर सुरक्षित भारत लौटते हैं। वहां से अपने देश वापस आयीं नर्सें नए खलीफा के लोगों की बहुत तारीफ़ करती हैं और कहती हैं kf उन लोगों इन्हें बहुत ही स्नेह दिया और बहन-बहन कहते रहे, वैसे भी नर्सों को लोग सिस्टर कहते ही हैं। हाँ, अगर इन सिस्टर्स ने कह दिया होता की वो जालिम कसाई हैं तो वहां फँसे अन्य हिन्दुस्तानियों के लिए खतरा हो सकता था। फिलहाल कश्मीर में उस खलीफा के पक्ष में झंडे लहराए जाने की खबरें भी आ रही हैं।

बताया जाता है की खलीफा के लोगों ने जिन इलाकों पर कब्ज़ा किया है वहां के लिए अपना पासपोर्ट भी जारी कर दिया है, यानि उनका देश अस्तित्व में आ चुका है। अपने देश में में तमाम लोग खलीफा की तारीफ़ कर रहे हैं और कह रहे हैं कि वह सही रास्ते पर जा रहा है, क्योंकि उसने इस्लाम के विरुद्ध चलने वालों का नाश करने का फैसला लिया हुआ है। खलीफा ने भी एक वीडियो जारी किया, जिसमें वह दुनिया को बता रहा है की न जाने कितने सौ साल बाद सही राह दिखलाने वाला मिला है और सब लोग उसकी शरण में आयें। वहीँ, जिस समुदाय को वहां पीड़ित बताया जा रहा है उससे ताल्लुक रखने वालों की बड़ी संख्या भारत में भी है जो अपने धार्मिक स्थलों को गिराए जाने से दुःखी हैं और अपने धर्म-बंधुओं के मारे जाने से मातम मना रहे हैं। उन लोगों की संख्या कम तो नहीं है फिर भी सरकार उनकी सुनना नहीं चाहती।

सरकार ऐसे किसी भी लफड़े में नहीं पड़ना चाहती, क्योंकि वो अभी तक पुरानी सरकार के ही फैसलों पर चल रही है या पुरानी सरकार गठबंधन धर्म के चलते जो कर नहीं पाती थी लेकिन करना चाहती थी, उसे अब यह बहुमत वाली नयी सरकार कर रही है। जाहिर है कि मनमोहन सिंह और सोनिया गाँधी से अधिक खुश इस समय कोई नहीं होगा। चूँकि पुरानी सरकार के समय इराक संकट शुरू नहीं हुआ था इसलिए कोई प्लान बना ही नहीं था तो नयी सरकार आखिर किस गाइडलाइन पर चलती? ऊपर से भारत सरकार के सामने समस्या है कि खलीफा बगदादी की निंदा कर दे और उधर बगदादी के देश को मान्यता मिलनी शुरू हो जाय तो धंधा पानी और तमाम अन्य रिश्ते कैसे रखे जाएँ, उसकी भी तो रणनीति बनानी ही पड़ेगी। इसलिए न उधो का लेना न माधो का देना वाली नीति ही ठीक है। अब कितनी भी मजबूत सरकार हो लेकिन तमाम मामले ऐसे होते हैं, जहाँ मजबूर हो जाना पड़ता है और कोई निर्णय लेने से बेहतर है की बड़बोले लोग भी चुप्पी साध लेते हैं। इस नाते सरकार चुप हो गयी और उधर कार्यक्रम अपने हिसाब से ही जारी है।

हाँ, जब इराक में खलीफा काबिज हो गया तो उधर इजराइल और फिलिस्तीन का पुराना हिसाब भी शुरू हो गया। इजराइल ने आरोप लगाया कि हमास के लोगों ने उसके तीन बच्चों की हत्या कर दी और फिर फिलिस्तीनी रिहाईशी इलाकों पर मिसाइल बरसाना शुरू कर दिया। सैकड़ों लोग मार डाले गए, जिसके लिए इजराइल कह रहा है की हमास वाले नागरिकों का ढाल के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं जिसके चलते वो मारे जा रहे हैं। दुनिया भर में इजराइल के खिलाफ प्रदर्शन शुरू होने लगे, भारत में भी लोगों ने इजराइल की मजम्मत के लिए नारे लगाए, लानतें भेजी गयीं। दिल्ली में इजराइल के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे लोगों पर पुलिस ने ज्यादतियां कीं तो जाहिर ही था तमाम लोग बस इस लिए खुश होने का घृणित काम कर रहे थे की इजराइल मुसलमानों को मार रहा है।

फिलिस्तीनियों पर गिरते राकेटों को देखते इजराइलियों की तस्वीरें सोशल मीडिया पर दौड़ने लगीं, लगता था कि कोई तमाशा देखने का मजमा लगा है, क्रूर तमाशा। वहीं, भारत में भी खुशियाँ मना रहे लोगों के लिए मन में दया का भाव ही आ सकता है, और कुछ नहीं। हाँ, प्रदर्शनकारियों पर दिल्ली पुलिस की ज्यादती से कुछ लोगों को यह कहने का मौका जरूर मिल गया कि एक "हिन्दुवादी " सरकार गलत मानसिकता से काम कर रही है। लोकसभा में तो विपक्ष कुछ वजन के साथ बोलने की भी संख्या नहीं रखता, हाँ अभी राज्यसभा में वह भारी है लेकिन वहां भी इजराइल के खिलाफ निंदा प्रस्ताव नहीं लाया जा सका। सरकार की तरफ से कहा गया की किसी देश के मामले में यहाँ डिस्कस करने की जरूरत नहीं है।

हाँ, हलके शब्दों में बाहर निंदा जरुर कर दी गयी की इजराइल नागरिकों के ऊपर हमले न करे। राष्ट्रवादी कहे जाने वाले लोग इस कदम को एक मजबूत कदम बताते थक नहीं रहे थे तो वहीं मानवाधिकार का झंडा उठाये तमाम लोग निराश थे की इस सरकार से और किसी चीज की अपेक्षा ही नहीं की जा सकती थी।

प्रधानमंत्री ब्राज़ील गए थे तो वहां भी इजराइल पर कुछ हल्की-फुल्की बात ही हुई थी और देश में बहुत सारे लोग मान रहे थे कि सरकार इजराइल परस्त ही रहेगी, क्योंकि ये भी दक्षिण पंथी और वो भी, लेकिन खेल पलट दिया सरकार ने यूएन में, वोटिंग के दौरान जहाँ इजराइल के खिलाफ वोट करने का फैसला ले लेती है। अब राष्ट्रवादी कहे जाने वाले लोगों को समझ में ही नहीं आ रहा है कि इस फैसले का कैसे बचाव करें? अमेरिका के अखबार में एक हिन्दुस्तानी लेखक लिख रहे हैं की मोदी जी बात समझ नहीं पाए और एक गलत फैसला ले बैठे क्योंकि भारत का भला इजराइल से दोस्ती बनाये रखने में ही होगा।

देश में भी काफी हल्ला मचा हुआ है और भक्त हजम नहीं कर पा रहे हैं की हिंदू-हिंदू चिल्लाने वाले ये क्या कर बैठे? मुसलमान का साथ दे दिया? तमाम लोग तो यह भी कह रहे हैं की इजराइल के विरोध में वोटिंग का मतलब आतंकवादी हमास का समर्थन करना। भईया जी, यासिर अराफात को भी एक दुनिया भारी आतंकवादी मानती थी जबकि उनकी इंदिरा गाँधी से गले मिलते हुए तस्वीर कितनी फेमस हुई थी, याद है? वो इंदिरा जी के अच्छे मित्र थे। हाँ, साथ में इजराइल से भी लेना-देना चलता ही रहता था। अब यही समझ लीजिए कि चूँकि फिलिस्तीन के मुद्दे पर काँग्रेस सरकार की कभी कोई नीति थी, जिसे मोदी सरकार ने विस्तार दे दिया अन्यथा इमानदारी से कहें तो फिलिस्तीनी आतंकवाद भी निंदनीय है और एक देश की तरफ से जारी आतंकवाद भी। इसी नाते सरकार ने इजराइल के खिलाफ वोट कर दिया, क्योंकि ऐसा भी नहीं हो सकता की गलती से वोट पड़ गया, वहां जो वोटर बैठते होंगे वो सोच समझ कर ही काम करते होंगे।

अब जो लोग दुःखी हो रहे हैं उन्हें चाहिए कि अपनी सरकार से पूछें की जब यही करना था तो दिल्ली में लाठी क्यों चलवाई, उन लोगों पर जो इजराइल का विरोध कर रहे थे? या तो सरकार की अपनी कोई नीति नहीं या फिर कोई घाघ प्लानिंग है जो आम लोगों को समझ में नहीं आ रही है। चकरा गए हैं वो तमाम लोग जो अबकी बार चाहते थे कुछ नया। क्योंकि सरकार का फैसला कब क्या हो जाए, यह समझ से बाहर होता जा रहा है। फिर फिलिस्तीन के मुद्दे पर सरकार का कदम ‘राष्ट्रवादी’ कहे जा रहे लोगों की आशाओं के अनुरूप भले ही न हो, लेकिन मानवता के तो हित में ही है। कभी जार्डन के शाह के लिए पचीसों हज़ार फिलिस्तीनियों को मारने वाला पाकिस्तानी सेना का ब्रिगेडियर मर्द-ए-मोमिन का ख़िताब पाता और जब जनरल होने पर पकिस्तान की गद्दी पर कब्ज़ा करता है तो एक दुनिया जनरल हो चुके उस अफसर जिया-उल-हक़ को इस्लाम का सबसे जांबाज नायक मानने लगती है, जबकि उस दिन फिलिस्तीनी शोक मनाते हैं।

कम से कम हम तो यह कह सकते हैं कि कोई भी सरकार बने, भारत कुछ मुद्दों पर अपनी समझ रखता है और जहाँ अधिक मज़बूरी न हो, वहां मजबूती से उस समझ का प्रयोग करता है। हाँ, इस बार अजीब हालत जरूर है, क्योंकि भक्त उदास हैं और आलोचना करने वाले फिलहाल समझ नहीं पा रहे हैं कि ये कौन से मोदी हैं। हाँ, तेल के लिए अरब लीग को खुश करने का फैसला बताने वाले जरूर गलतफहमी में हैं, क्योंकि लीग तो अब अमरीकी हो चुकी है, तेल तो वो देंगे ही। हाँ, इजराइल से भारत के समझौतों पर भी कोई अधिक असर पड़ने वाला नहीं है, क्योंकि कुछ बातें बाहर होती हैं तो तमाम अंदर। फिर भी बड़ी खबर तो है कि मोदी सरकार ने इजराइल के खिलाफ वोट किया।