मल्लिका सहरावत की बात


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हरियाणा में लड़कियों की क्या स्थिति है किसी से छुपी नहीं है, आपको रिसर्च करने की जरूरत नहीं। माहौल ऐसा की शहर हो या देहात एक अलग तरह का खौफ रहता है। ऊपर से खाप की पैदाईश समाज अभी भी बदलने के लिए तैयार नहीं है। बदलाव लाने के लिए बगावत करनी पड़ती है। कभी-कभी बगावत सही दिशा में ले तो जाती है, लेकिन प्रायः दिशा ऐसी हो जाती है कि मिस गाईडेड मिसाईल की तरह कुछ भी हो सकता है।

कुछ फ़िल्में बम्बई में मिली जरूर, लेकिन वो ऐसी नहीं रहीं कि मल्लिका हिट हो जाए पर खुद को हिट करने का हुनर जिसको मालूम हो उसे दिक्कत बहुत अधिक नहीं होती।

समाज न सुधरे तो बगावत अंतिम उपाय है और यही तरीका अपनाया एक बंद समाज की रीमा लांबा ने। भरा-पूरा घर, ताऊ-ताईयों के ताने-बाने के साथ एक रौबदार बाप के अधीन रीमा जो आईने के सामने खुद को माधुरी दीक्षित समझती और खुद ही को अपने स्टेप्स दिखाती रहती अपने बाप के सामने लाचार थी। बाप किसी खाप के चौधरी तो नहीं, न ही किसी गाँव में हुक्का गुड़गुड़ाते अनपढ़ आदमी थे, जो बिटिया के भाव और समाज की धारा नहीं समझ सकते हों। अच्छे- भले इंजीनियर थे, देश दुनिया के बदलावों से वाकिफ, लेकिन उनके दिमाग में भी खाप ही घुसी थी। हरियाणा से दिल्ली आ गए तब भी खाप साथ ही लेकर आए, बिटिया को पढ़ाया-लिखाया सब किया लेकिन चाहत यही कि जैसे परिवार की अन्य लडकियाँ पढ़-लिख भी जाटों के नत्थे लगा दी गयीं, वैसे ही उनकी बिटिया भी हो जाये। बिटिया ने कहा की ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि उसकी अपनी चाहत है, ऐसा कहना था कि बिटिया बाप के लिए मर गई।

बिटिया ने हार नहीं मानी, माँ उसके साथ थी, लेकिन माँ की मज़बूरी थी कि वो पहले अपने पति की बात सुने। माँ ने सहयोग करने से इनकार कर दिया लेकिन नानी ने थोड़े से जेवर दिए और बोली की जा बिटिया करले अपने सपने पूरे। रीमा ने घर छोड़ा और साथ ही छोड़ दिया अपने बाप का नाम, चली आई बम्बई। बम्बई के मुताबिक नाम रखा मल्लिका और आगे की समस्या दूर करने के लिए नानी के परिवार की टाईटिल जोड़ ली सहरावत और रीमा लांबा बन गई मल्लिका सहरावत। मुम्बई में ढेरों खोलियां तमाम लोगों को सपने शुरू करने की पहली जगह देती हैं। मल्लिका को भी मिल गई और शुरू हुआ लोकल ट्रेन के लेडीज कम्पार्टमेंट से सपनों की दुनिया की ओर सफ़र। तमाम लोग ताउम्र यही करते ही फिर अपने बच्चों का टिफिन बनाते और उनको भेजते हुए बम्बई को कोसते रहते हैं। मल्लिका को शाहरुख खान के साथ एक कार का विज्ञापन मिल गया, सुपरस्टार के साथ शूट करने से बड़ा ब्रेक मिला लेकिन ब्रेक के लिए कुछ और भी करने की जरुरत होती है जिसके लिए जट्ट तैयार नहीं थी, उसकी मानें तो इसी कारण उसको लम्बा संघर्ष करना पड़ा। वैसे उसकी लम्बाई भी कम नहीं है और वो कोई ब्रह्माण्ड सुंदरी भी नहीं थी की हीरो उसके साथ हाईहील पहन कर काम करने को तैयार हो जाते।

कुछ फ़िल्में बम्बई में मिली जरुर लेकिन वो ऐसी नहीं रहीं कि मल्लिका हिट हो जाए पर खुद को हिट करने का हुनर जिसको मालूम हो उसे दिक्कत बहुत अधिक नहीं होती। वैसे फ़िल्में अधिक न मिलने के बावजूद मल्लिका ने खुद को बनाये रखा और चर्चा में बनी रही, इसी बीच उसने कहना शुरू कर दिया की उसके टैलेंट की कद्र बोलीवुड में हैं ही नहीं और उसके सही पारखी हॉलीवुड में ही हैं। सुनते हैं कि जैकी चैन की नज़र मल्लिका पर पड़ गई और उनकी फिल्म के लिए ये हिरोइन चुन ली गई। मल्लिका के नाम पर फिल्म इण्डिया में भी प्रमोट की गई, उसी के सहारे जैकी चैन का भी नाम हो गया। लेकिन दर्शकों के साथ टोटल फ्रॉड किया गया क्योंकि फिल्म में मल्लिका का दो मिनट से अधिक का रोल ही नहीं था वैसे ये कोई बड़ी बात नहीं है हॉलीवुड अधिकांश भारतीय सितारों के साथ ऐसा ही व्यवहार करता है। रेसिस्टों को पता है की ज्यादा मौके दिए गए तो नामी गिरामी सितारों का डिब्बा बंद हो जायेगा। पिछले साल बहुत प्रचारित एक फिल्म आई थी जिसके इन्डियन प्रोमो में अनिल कपूर को दिखाया जाता था लेकिन फिल्म में इस सुपरस्टार के दर्शन उतनी देर के लिए भी नहीं हुए जितने समय में मैगी उबल जाती है। ऐसे में मल्लिका को भी दो मिनट देना बहुत बड़ी बात है लेकिन मल्लिका बताती हैं की उसी दो मिनट के सीन से ही जैकी चैन उसके ‘बहुत अच्छे’ दोस्त बन चुके हैं और हमेशा पहचान लेते हैं और गर्मजोशी से मिलते हैं। ये बहुत बड़ी बात है क्योंकि जैकी चैन पता नहीं एश्वर्या बच्चन को पहचानते हैं की नहीं पर मल्लिका।

खबर ये भी थी मल्लिका लॉसएंजेल्स में शिफ्ट हो गईं हैं, जिसके पास महीने में एक भी शिफ्ट का काम न हो उसका लाए में शिफ्ट होना चमत्कार ही है। लेकिन फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी का नारा लगाते हुए मल्लिका फिर भारत आ गई हैं क्योंकि अमेरिका वाले फ़्लैट का भाड़ा भी तो देना है और लग रहा है कि इनके लिए बहुत मेहनत करने वाली जैकी चैन की पीआर कंपनी भी अधिक ध्यान नहीं दे रही है, क्योंकि वैसे ही जैकी हमेशा सौ लोगों की टीम के साथ शाही अंदाज में चलते-फिरते हैं, वहां दो मिनट की रोल वाली को कब तक याद रखेंगे, हिस्स। अब मल्लिका टीवी पर डेटिंग कर रही हैं, जिस बाप के चलते घर से भागी थीं, पता नहीं उनपर क्या बीत रही होगी, लेकिन ये पक्का है की बदलाव या क्रांति जैसी बातों में बाप का ख्याल नहीं रखना पड़ता, केवल मिशन की ओर ही देखना पड़ता है नहीं तो गए। हिसार के मोठ गाँव की रीमा लांबा वहाँ से कुछ दूर ढानी कुंदनपुरा में शूटिंग के लिए पहुँची तो उसके खानदान और गाँव की सभी महिलाएं वहाँ अपनी बेटी को आशीर्वाद देने के लिए तैयार थीं, बिटिया सबसे मिल भी ली लेकिन अपने पैतृक गाँव में जाने की हिम्मत नहीं हुई क्योंकि उसने लांबा को पीछे ही छोड़ दिया था, वो अब मल्लिका सहरावत है जो अपने दम पर अपना मुकाम बना रही है। हाँ, उसे ये तकलीफ है कि थक कर जब घर या लौटती है तो सूनी दीवारें उसका स्वागत करती हैं, इसलिए वो खुलेआम फतेहगढ़ के किले में, दुनिया भर के लोगों के सामने अपनी पसंद का लौंडा (जाट, लड़कों के लिए यही शब्द इस्तेमाल करते हैं) छांट रही हैं, जिसके साथ बात बने तो आगे भी जिंदगी गुजारी जाए। ‘द बैचलरेट इण्डिया - मेरे ख्वाबों की मल्लिका’ एक प्रोग्राम भर ही नहीं है, वह एक तमाचा है एक इंजीनियर पिता और खाप पंचायतों के ऊपर भी कि तुम अपनी बेटियों पर बंदिशें लगाओगे तो वो अपना खुद का रास्ता निकाल लेंगी और धरी रह जायेंगी तुम्हारी पंचायतें जो तय करती हैं कि तुम्हारी लौंडियाँ कैसे अपनी जिंदगी गुजारें। थोड़ी समझ के साथ, समय के साथ चलते हुए आज़ादी जरूरी है, वर्ना अधिक दबा कर रखने पर विस्फोट बहुत भयानक होता है और अपने साथ उड़ा ले जाता है सदियों से जड़ जमाए कचड़े को और फिर हवा हो जाती हैं सारी परम्पराएँ, बची रहती है केवल राख।