जिन्ना से एक मुलाकात


#1

जश्न पूरा हुआ लेकिन अब स्कूलों में लड्डू घोटाला भी हो रहा है, ऐसी आज़ादी से दिल को बहुत तकलीफ पहुँचती है। हल्के भोजन के
बाद भारी दिल के साथ बरसाती हवाओं ने सुला दिया, तभी कहीं से झटका लगा और आँख खुल गई, सामने मोहम्मद अली जिन्ना थे।

साझी विरासत के अजायबघर का एक अजूबा इंसान

जी हाँ, साझी विरासत के अजायबघर का एक अजूबा इंसान, दिल उछलने लगा, आँख मसलते हुए उनको आदाब फ़रमाया। कागज कलम उठाने को हुआ तो जनाब ने कहा कुछ लिखने की जरुरत नहीं है, सारी इबारतें धुँधली पड़ जाती हैं। मैं तो इधर घूमने आया था सोचा तुमसे मिलता चलूँ, देहरादून से मुझे भी मोहब्बत रही है, आखिर इण्डियन मिलट्री एकेडमी खड़ी करने वाली कमेटी का मेंबर था भाई।

पेश है उनसे बातचीत के कुछ अंश –

मलंग – अकेडमी घूम कर क्या करेंगे, यहाँ अफसरों को दुश्मन से लड़ना सिखाया जाता है, दुश्मन मतलब पाकिस्तान।

जिन्ना – पाकिस्तान का नाम मत लो, उससे कोई क्या लड़ेगा, वो खुद से लड़ रहा है। उदास आँखों से उन्होंने एक सिगरेट सुलगाई और
असमान की तरफ देखने लगे।

मलंग – कुछ लेंगे ? कौन सी लेंगे ?

जिन्ना – अंतिम समय में पीना छोड़ दिया था क्योंकि सबने कहा की अब आप बाबा -ए आज़म हो गए है, दारू बंद कर दीजिए क्योंकि
इस्लाम में ये हराम है।

मलंग — आप मुसलमान कब से हो गए सुना है की आप तो पोर्क भी …

जिन्ना — बस करो, यार मैं तो मुस्लिम लीग के चक्कर में मुसलमान बन गया लेकिन देखो पाकिस्तान की किताबों में मुझे मुसलमान ही बताया जाता है, शराब --वराब की चर्चा नहीं होती। और देखो आज़ादी के बाद पहली स्पीच में मैंने बोला था की हमारे मुल्क में जिसको मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारे जाना हो जाए, ये पर्सनल मसला है। स्टेट का इसमे कोई दखल नहीं होगा लेकिन हद है जिन्ना शिया है की सुन्नी इसको लेकर ही लोग कोर्ट चले गए।

मलंग — जी लेकिन आप पैदा तो शिया परिवार में ही हुए थे और आपकी बहन ने ही कोर्ट में सबसे पहले केस डाला की आपकी वरासत शिया कानून पर ही होनी चाहिए, ये फिर कैसा झगड़ा ?

जिन्ना – देखो, हम लोग बेसिकली गुजराती हैं और गुजरातियों को समझना किसी के बस की बात नहीं। याद है की बाद में अदालत ने ही
फैसला दिया था कि सेक्युलर होने के नाते कायदे -आज़म न शिया थे न सुन्नी।

मलंग – जी जनाब, लेकिन एक कोई गंजी है जिसने रिसर्च की थी की आप सुन्नी में कन्वर्ट हो गए थे और अभी कुछ साल पहले एक
अदालत का फैसला आया की ‘कुछ भी हो, कायदे आज़म शिया तो नहीं ही थे’ ?

जिन्ना — उस मुल्क वालों से बेहतर तो गधे होंगे भाई, मुझे बनाया बाबा -ए -आज़म और मेरी बहन को बना दिया मादरे - मिल्लत, जब मुझे मुल्क का बाप मानते हो तो मेरी बहन को मुल्क की माँ कहने का क्या मतलब है भाई? ये तो गालियों से नवाज़ने वाली बात है, इतनी बुरी गाली तो हिंदुस्तानी भी नहीं देते, इडियट पाकीज। आप भी कोई और बात करिए, मर गया तुम्हारा कायदे -आज़म; और जिरह जारी है की शिया था की सुन्नी! कोई अच्छी बात नहीं की जा सकती ?

मलंग – की जा सकती है, रत्तन बाई के बारे में बात की जाय ?

जिन्ना – आह रत्ती ! वो बम्बई की ही नहीं, दुनिया की नायाब कली थी। डियर ऐसा हुआ की सोलह की उमर में लंडन जाना पड़ा पढाई के वास्ते तो माँ ने कहा की शादी करके जाओ नहीं तो गोरी के चक्कर में फँस जाओगे तो गाँव की ही एक लड़की से कर ली और कुछ दिनों बाद ही चले गए और इधर वो लड़की बिचारी मर गई। लंडन से आने पर अपनी प्रैक्टिस बम्बई में जम गई, एक क्लाईंट के मार्फ़त रत्ती के डैडी से दोस्ती हो, सर दिनशा पेटिट बड़े आदमी थे। एक बार उन्होंने मुझे अपनी दार्जिलिंग की कोठी पर छुट्टियाँ बिताने के लिए बुला लिया और वहीं नाज़नीन रत्ती पर नज़र पड़ गई, गुजराती और सिन्धी के अलावा मेरी इंग्लिश जबरदस्त थी, अंग्रेज भी लोहा मानते थे।

मलंग — उर्दू नहीं आती थी ? क्या इसीलिए जब एक ही बार आप ईस्ट पकिस्तान गए और वहाँ अंग्रेजी में ही स्पीच दिया था और बोले थे इस इलाके को बांग्ला छोड़ कर उर्दू बोलनी चाहिए क्योंकि वही पाकिस्तान की बोली है और पब्लिक भड़क उठी थी ?

जिन्ना — हाँ तो रत्ती की मुझसे जमने लगी, चाय के बागानों में हमारे प्याले छलकने लगे लेकिन मुझे पता था की उसका बाप मानेगा नहीं
तो मैंने भी सोचा की इसके अठारह की होने तक वेट किया जाय। एक दफे क्या हुआ की दिनशा साहब बम्बई में मुझे समझा रहे थे की ये\ जो कम्युनल झगड़े हैं उनको ख़तम करना है तो इंटर कम्युनिटी शादियों को तरजीह देनी चाहिए, फिर क्या था, उनकी बात ख़तम होते ही मैंने उनकी बेटी हा हाथ मांग लिया। बंदा भड़क उठा, बोल पड़ा की अपनी बेटी के लिए तो नहीं कह रहा था, समाज की बात हो रही थी। हमारी दोस्ती दिनशा से तो टूट गई लेकिन रत्ती से चोरी -चोरी मुलाकात बढ़ गई, उसके बालिग होने में दो साल बाकी थे। सोचो जरा जिस आदमी ने पंद्रह सौ रुपये महीने की मजिस्ट्रेट की नौकरी को लात मार दिया की इतनी तो रोज की प्रेक्टिस कर लेंगे उसको दो साल का इंतजार ? बम्बई कारपोरेशन के एलेक्शन वाले केस में और तिलक के मुकद्दमे में मुझे जो सोहरत मिली थी वो रत्ती के बाप ने मिटटी में मिलाने की पुरजोर कोशिश की।

मलंग — लेकिन रत्ती आप से पचीस साल छोटी थी ?

जिन्ना – मोहब्बत में उम्र की बात ? अठारह पूरे होते ही रत्ती मरियम बन गई, हमारी कोठी में ही हम दोनों एक हो गए और उसके बाद नैनीताल निकल लिए, राजा महमूदाबाद ने वहाँ नवाबी इंतजाम कर रखा था। रत्ती के बाप ने इधर उसका किरिया करम कर दिया लेकिन मैंने कोई कसर नहीं छोड़ी, उसके लिए दुनिया के नायाब हीरे - जवाहर हाज़िर रखता था।

मलंग — आप के बारे में भी कहा जाता था की लन्दन के सिले सूट पहनते थे ?

जिन्ना — अपनी कमाई से पहनता था, लन्दन में न सिलवाता तो क्या पजामे सिलने वालों से सिलवाता ? और देखो मैंने तो मरते वक्त भी सूट ही पहना था, पजामे में निकलना मुझे कभी पसंद ही नहीं था। इसीलिए कई बार दिक्कत हो जाती थी, सन चालीस के आस पास कुछ लोगों ने कहा की अपनी दाढ़ी बढ़ा कर, मुसलमानी पोशाक में तस्वीर दे दीजिये ताकि आपके और लीग के मैसेज के साथ पर्चे छापे जाएँ तो मैंने सीरियसली कह दिया की मौलाना नहीं हूँ जो घर के बाहर पजामा पहनूँ और दाढ़ी क्यों ? दाढ़ी से मुस्लिम लीग का क्या मतलब ? ले जाओ किसी मौलाना की फोटो और नीचे मेरा नाम लिख देना।

मलंग – तो आपको लोग पहचानते नहीं थे ?

जिन्ना (सिगरेट सुलगाते हुए) — देखो जब आगा खां ने मुस्लिम -मुस्लिम का नारा लगाते हुए वाईसराय से भेंट की तो मैंने अपोज किया की ये क्या है, मुस्लिम लीग का अपोज किया और गोखले ने मेरी तारीफ की और कहा की हिन्दू मुस्लिम यूनिटी के लिए जिन्ना हमेशा जाना जाएगा लेकिन गोखले इधर मर गए और दादा भाई लन्दन रहने लगे, मैं अकेला पड़ गया। 1920 के नागपुर काँग्रेस में मुझे मंच से हटा दिया गया और उसी शहर में मुस्लिम लीग की भी मीटिंग थी जहाँ मैं नहीं गया लेकिन किस्मत देखो उसी लीग का फिर मरते दम तक प्रेसीडेंट रहा। छोड़ो यार सियासी बातें, इसी बीच मेरी रत्ती भी जन्नतनशीं हो गई, जिंदगी में पहली बार जिन्ना रोया। अब काँग्रेस की पोलिटिक्स ने मुझे लीग की सियासत के लिए मजबूर कर दिया, मैंने भी लन्दन से ही वकालत सीखी थी। खैर छोड़ो ये सियासी बातें

मलंग — बाकी तो पता है की आप ने कत्लेआम शुरू करवा दिया, हिंदुस्तान के टुकड़े करवा दिए, कश्मीर आजतक फँसा है, अब क्या बात की जाय?

जिन्ना — देखो एकाएक अंग्रेजों ने मुझे जो भाव देना शुरू किया की मैं भी खुद को मुस्लिम गाँधी ही समझने लगा, मुझे खुद अपनी औकात बहुत बड़ी लगने लगी। अब वो सब बात करने लायक नहीं है, मुझे बस इतना याद आता है की टीबी और फेफड़ों के कैंसर के चलते हालत ख़राब हो रही थी। मैं पहाड़ पर चला गया था, मुल्क बनने की पहली सालगिरह पर मैंने किसी और से कहा की जो मन में आए वो लिख कर रेडिओ पर मेरे नाम से बोल दे ।

मलंग – कुछ ऐसा ही तो बापू ने आज़ादी वाले समय भी कहा था ?

जिन्ना – हमें क्या पता, नेहरु जानते होंगे। मुझे तो इतनी याद है की हालत बिगड़ने पर मुझे फिर पहाड़ से कराची लाया गया, कराची हवाई अड्डे से जिस एम्बुलेंस से सब मुझको लेकर चले, बीच रस्ते में उसका एक हिस्सा टूट कर अलग हो गया। साथ और गाड़ियाँ थी लेकिन मेरा स्ट्रेचर कार में कैसे जाता, धूप और धूल में सड़क के किनारे कायदे --आज़म पड़ा रहा जब तक की दूसरी एम्बुलेंस न आगई। एक घंटे बाद एम्बुलेंस आई और कराची के घर में पहुँचने के दो घंटे बाद मेरी मौत हो गई।… लन्दन में एक स्टूडेंट था तो शेक्सपियर के ड्रामे करने का शौक था लेकिन अपनी तो जिंदगी ही …

मलंग – लेकिन आपका कद तो तब तक बहुत बड़ा हो गया था, चैन से मरे होंगे ?

जिन्ना — मरते वक्त छत्तीस किलो का हो गया था।

फिर जिन्ना ने एक हवाना सिगार निकाला, हवा में छल्ले उड़ाए, मैंने पूछा कितनी पीते है? कुछ और बात है की सो जाऊँ, बाबा -ए आज़म ने कहा की एक दिन में चालीस सिगरेट और ब्रेक में सिगार लेता हूँ; उठते हुए बोले ‘टोबैको किल्स’ और गायब हो गए।