विशेषः आप का नशा


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जब से आप का उदय हुआ है तमाम टीवी चैनलों पर उसी का कब्ज़ा है, कुछ लोग क्रांति क्रांति का प्रचार करते करते खुद ही पार्टी में शामिल हो गए, तो वहीं तमाम अन्य लोग भी लाईन में लगे हुए हैं।

न खेलेंगे न ही खेलने देंगे ,खेल ही बिगाड़ देंगे

आशुतोष ने एक भावुक लेख लिखा था कि कैसे उन्होंने घर में चर्चा की, फिर निर्णय लिया गया की घर पत्नी की छोटी मोटी नौकरी से चल जाएगा और उन्होंने बड़ी नौकरी को लात मार कर अरविंद जी की जलाई मशाल को पकड़ने का फैसला कर लिया। तमाम लोग जिनकी पत्नियाँ छोटी-मोटी नौकरियां नहीं कर रही हैं, फिलहाल मनमसोस कर रह गए वरना उनके पास भी मौका था की वो इस नई क्रांति में शामिल हो जाते, अफ़सोस की इस नामुराद दाल रोटी के चक्कर में पड़ने वाले कभी क्रांति नहीं कर सकते। हाँ, तमाम ऐसे लोग जिनकी दाल रोटी उनकी संस्थाएं चलाती हैं और इस काम के लिए प्रोजेक्ट रिपोर्ट में हेर फेर भी नहीं करना पड़ता, आप की तरफ टूट पड़े हैं, सबको अब नई संभावनाएं दिखने लगी हैं, क्योंकि ऐसे लोगों की संस्थाएं अब स्थापित हो चुकी हैं और संस्थापक को उधर देखने की जरूरत नहीं है। इसके अलावा टीवी देखने वाला एक बड़ा वर्ग भी अब आप के समर्थन में है, हालाँकि दिल्ली को छोड़ जाने से तमाम लोगों को शंका भी है कि जब एक राज्य कुछ दिन नहीं चला पाए, तो देश कैसे चलायेंगे फिर भी उम्मीदों पर ही दुनिया कायम है। इसलिए लोग उम्मीद से हैं।

आम जनता का भी बड़ा वर्ग आप का शुभचिंतक है, इस बात से इंकार शायद ही कोई दल करे, लेकिन वोट कितना पड़ेगा पक्ष में, यह देखने की बात होगी। आप के पैदा होते ही तमाम कयास लगाए जाते थे कि इसको किसने पैदा किया है, कुछ कहते कि भाजपा की देन है, तो कुछ कहते की काँग्रेस ने उकसाया है, लेकिन हकीकत है कि दोनों की नाकारी से और दोनों के नापाक गठजोड़ से पैदा होना पड़ा आप को। कॉमनवेल्थ खेल अकेले कलमाड़ी नहीं खेल रहे थे, भाजपा के तमाम नेताओं की भी सक्रिय भागीदारी थी और दिल्ली का भ्रष्टाचार केवल शीला दीक्षित के ही जिम्मे नहीं था। म्युनिसपल कार्पोरेशन में भाजपा खेल रही थी। खैर अब वो सब किस्से पुराने पड़ चुके हैं।

आप न्यू मीडिया का इस्तेमाल बेहतर ढंग से करना जानती है और टीवी कैमरों को कब अपनी तरफ मोड़ना है इस बात की भी कला उसे आती है। बीच-बीच में राहुल गाँधी के जन संवाद या नरेन्द्र मोदी की रैलियों के समय टीवी का फोकस आप से हट जाता है, क्योंकि मार्केटिंग टीम का दबाव भारी पड़ जाता है, लेकिन रैली के विश्लेषण के बाद फिर आप ही आप। काश, इस कला का इस्तेमाल अन्य दलों को भी बेहतर ढंग से करना आता तो टीवी दर्शन अधिक रोचक होता, क्योंकि अब तो इस लोकसभा का सत्रावसान हो चुका है, जिसके चलते दर्शक सर्वदलीय कला देखने से वंचित हो चुके हैं। भले ही काँग्रेस कट्टर सोच नहीं, युवा जोश का नारा दे रही है, लेकिन वो एक बुढापे में पहुँच रही पार्टी है, क्योंकि राहुल गाँधी कितना भी दावा करें युवा जोश कहीं दिखाई दे नहीं रहा है। उस दल का जोश तब दिखता है, जब किसी बुजुर्ग नेता की कोई दूसरी कहानी सामने आती है वरना, सब वही घिसे-पिटे फार्मूले, जो कहीं से भी जोश जगाते नहीं दिखते। भाजपा तो समय से पहले ही चुनाव को लेकर दौड़ने लगी थी और बिगुल बज जाने पर हाँफती हुई दिखाई दे रही है। अब इस स्थिति के लिए देसज बोली में कहें तो पार्टी की हंफनी छूट रही है। हालाँकि, पार्टी ने खण्डन कर दिया है कि अडवाणी ने कभी भी ‘वन मैन पार्टी’ में बदल चुकी पार्टी जैसी कोई बात नहीं कही है, फिर जो है वो तो दिखाई दे ही रहा है।

भ्रष्टाचार मुक्त भारत के लिए संकल्प लेने की बात करने वाले राहुल जी के मंच पर अशोक चह्वाण और साथ में कोयला घोटाले के आरोपी सांसद दिख रहे हैं, दागियों को बचाने वाले जिस अध्यादेश को राहुल जी ने फाड़ा था, वो लालू जी को कभी भूल नहीं सकता, इसी कारण उनको जेल यात्रा भी करनी पड़ी और उनका किसी सदन में जाना बाधित हो चुका है लेकिन अब उनके दल का काँग्रेस के साथ मिलाप हो चुका है। भाजपा के मंचों पर येदुरप्पा की वापसी हो गई है और ए राजा और कानी मोझी के गुरु या बाप, जो भी कहिये करुणानिधि एकाएक मोदी जी को अपना प्रिय मित्र बताने लगे, और भाजपा इसका खण्डन भी नहीं कर सकी, क्योंकि जया फिलहाल तीसरे मोर्चे से प्रधानमंत्री बनने की जुगत में हैं। ऐसे में भ्रष्टाचार दलों के लिए कोई मुद्दा ही नहीं है। यहाँ तक कि शीला जी को केरल का राज्यपाल बना कर उनका पुनर्वास कर दिया गया लेकिन दक्खिन के लेफ्ट वाले भी इसके विरोध में कुछ बोले हों, ऐसी कोई खबर नहीं है। मतलब साफ़ है कि न दलों के लिए कोई मुद्दा है, न किसी के दिल में ही है इमानदारी से क्योंकि सबके लिए अब एक ही फार्मूला है कि मैं खा सकता हूँ, तो दूसरे को भी खाने दूं। हाँ, जो इसमें सहयोग न करे, उसे जरूर अलग-थलग किया जाए। लगता है की अरविंद जी को भी लग चुका है की पब्लिक इस मुद्दे को समझ चुकी है, इसलिए बात बात में धरना देने की बजाय वो अब दिल्ली से बाहर रियलटी चेक करने पहुँच रहे हैं, ताकि टीवी कैमरों का फोकस बना रहे।

केजरीवाल ने दिल्ली छोड़ कर पहली रैली हरियाणा में की, वहाँ उनको संभावनाएं दिख रही हैं। यूपी भी आये और कभी कौन है ये अरविंद केजरीवाल कहने वाले युवा सीएम ने पूरा ध्यान रखा की कहीं कोई दिक्कत न हो। शांति पूर्वक आप का कार्यक्रम यूपी में निपट गया था और सकुशल अरविंद वापस भी चले गए।

अब सदी के महानायक हमेशा कहते हैं कि कुछ दिन तो बिताओ गुजरात में, पता नहीं उनकी पत्नी जिस पार्टी में हैं उससे जुड़े लोग जाते हैं की नहीं, लेकिन अरविंद ने फैसला कर लिया जाने का। साथ ही गौहाटी से लेकर चेन्नई तक हर जगह मोदी जी ने भी गुजरात की गाथाएं सुनायीं, आम आदमी भी जानना चाहता था की आखिर कैसा है गुजरात, तो आम आदमी के ताज़ा अगुआ केजरीवाल ने फैसला कर ही लिया की चला जाए गुजरात।

गड़बड़ यहीं हो गई, क्योंकि सोनिया जी के राजनैतिक सलाहकार अहमद पटेल साहब भी गुजरात से ही हैं, लेकिन उन्होंने पता नहीं क्या पाठ पढ़ा दिया है कि उनका संगठन धूल चाट रहा है गुजरात में और काँग्रेसी भाई लोग दम लगा कर देश को बता ही नहीं पा रहे हैं कि है कैसा गुजरात। क्या हुआ था तो सब जानते हैं लेकिन क्या हो रहा है ये बताना अधिक जरूरी है। दिल्ली में जब मंत्री जी रात में कहीं छापा मरने जाते थे या दौरे पर निकलते थे तो टीवी वाले साथ रहते थे ऐसे में खुद सर श्री दुनिया के सबसे चर्चित इलाके में जा रहे हों, जहाँ के कार्यों के दम पर मोदी जी दिल्ली पर धावा बोलने जा रहे हैं, तो टीवी कैमरे साथ न हों ऐसा कैसे हो सकता है। अरविंद भाई को क्या ये नहीं पता था की दिल्ली का कोई भी कानून केन्द्रीय मंत्रीमंडल की अनुमति के बगैर नहीं बन सकता, वो भी जन लोकपाल जैसा नीतिगत मुद्दों का बड़ा कानून, फिर भी उसी के नाम पर शहादत दे दी। गुजरात में इनका दोष नहीं था, इन्हें क्या मालूम की ये बीच रस्ते में रहेंगे तभी आचार संहिता लागू हो जाएगी। अब रास्ते में ही लागू हो गई तब साथ चल रही गाड़ियों को कहाँ भेजते भाई? चैनलों पर छा जाने का मसाला मिल गया जब पुलिस ने इनको थाने घुमवा दिया,एक एक्स सीएम के साथ ऐसा बर्ताव यही दिखाता है कि आम आदमी की कद्र पुलिस नहीं करती जैसे किकी इनके एक मंत्री से दिल्ली पुलिस की लाइव भिडंत रात में हुई थी वरना साधारण विधायक से भी पुलिस के अफसर कितनी अदब से बात करते हैं सब जानते हैं। अब तुरंत दिल्ली की मीडिया ने फ्लैश किया कि केजरीवाल हिरासत में और मजे की बात देखिये की जो काम काँग्रेस को करना चाहिए था वही काम करने केजरीवाल पहुँचे थे, यानि काँग्रेस की जमीन जो भी बची थी, उस पर अपनी फसल काटने पहुँच गए, लेकिन काँग्रेस सबसे पहले आप के बचाव में आ गई। पहले से ही हांफ रही भाजपा में भी अभी कुछ सुगबुगाहट हो इसके पहले ही आप की दिल्ली यूनिट ने भाजपा के दफ्तर पर धावा बोल दिया, जाहिर है की टीवी का सही इस्तेमाल करना इस पार्टी को बखूबी आता है।

आखिर सूचना तकनीक का बेहतर इस्तेमाल ये ही करते हैं, एकाएक फ्लैश मॉब जुट गई और क्रांति शुरू हो गई। पुराने पत्रकार और एक प्रोफेसर साहब को भी नहीं पता था कि अब आचार संहिता लागू हो चुकी है और किसी भी प्रदर्शन के लिए पुलिस से अनुमति लेनी पड़ेगी, लेकिन पहुँच गए साहब, साथ में गाँधी जी के असली वंशज भी रहे। अब अरविंद जी ने प्रमाणपत्र दे ही दिया है कि उनके कार्यकर्ता शांति पूर्वक प्रदर्शन कर रहे थे तो इस बात को मानना ही पड़ेगा, लेकिन बुद्धि भाजपाईयों की भी घास चरने गई थी, इतना बड़ा ऑफिस है, थोड़ा पीछे हो लेते, टूटने देते गेट। लेकिन बताया जा रहा है कि बगल वाले बंगले में अरुण जेतली जी बिस्तर पर पड़े थे, उनकी तबीयत खराब थी इसलिए भाजपा के लोग भी आप के गेम में फंस गए। उस समय तो नियमित की प्रेस ब्रीफिंग के बाद चाय नाश्ता कर रहे कुछ पत्रकार भी अन्दर रहे होंगे, सबने खेल देखा और फंसती चली गई भाजपा खेल में, दोनों तरफ से ले दनादन चलता रहा जो पूरे देश ने देखा।

इसी समय, लखनऊ में भी कुछ आपियों के भीतर जोश आ गया और वो वहाँ पहुँच गए भाजपा ऑफिस जहाँ दोनों पार्टियों ने लट्ठमार होली खेली और पुलिस आनंद लेती रही, पुलिस का क्या जा रहा था। वैसे अभी पुलिस कुछ दिन पहले कानपूर में मर्दानगी दिखा कर फंस ही चुकी थी। सोचा होगा कि अगर अबकी आम आदमी हड़ताल पर चला जाएगा तो दिक्कत हो जाएगी, इसलिए किनारे देखती रही और पूरा जोश निकाला आप और भाजपा के जवानों ने लेकिन अफ़सोस की अब लोकसभा टिकट शायद बंट चुके हैं वरना ये वीर भी दावेदारी करते। उधर, राष्ट्रीय राजधानी के एक महत्वपूर्ण इलाके में छाई अराजकता को काबू में करने के लिये पुलिस को पानी की बौछार करनी पड़ी और अबकी तो बिल की भी चिंता नहीं थी। अब आशुतोष जी ने कह दिया है कि दिल्ली पुलिस मोदी से मिली हुई है, जबकि यही जवान केजरीवाल जी की रात भर रखवाली करते रहे थे जब वो उनमें से ही किन्ही को हटाने के लिए फुटपाथ पर सो गए थे। जो भी हो, लेकिन एकबार फिर से देश भर के लोग टीवी पर इसी ड्रामे को देखने के लिए मजबूर हैं और जिनके पास टीवी देखने का वक्त नहीं है या जो इससे दूर हैं वो सुरक्षित बचे हुए हैं, लेकिन न जाने कब और भी ख़बरें आयेंगी सामने, क्योंकि देश में तमाम दल हैं और रोज कहीं न कहीं कुछ हो ही रहा है पर खबर बनती ही उसकी है, जिसे ख़बरों से खेलने आता है। वरना कोई कुछ भी कर गुजरे उसकी चर्चा ही नहीं होती और खबर बनाने की कला और उसे फिर खेल जाने का कौशल जितना इस नई पार्टी में है उससे बहुत दूर हैं अभी तक ये परम्परागत राजनीति करने वाले, इसलिए कहीं आप के दाँव पर भाजपा खिलखिलाती है, तो कहीं लगता है की आप की किसी हरकत से काँग्रेस झूम जाती है।

पता नहीं कब तक समझेंगे ये दोनों, क्योंकि सरकार तो इन्हीं को बनानी है, क्योंकि केजरीवाल फिर एक बार कह चुके हैं कि लोकसभा में सौ सीटें तक जीत जायेंगे, लेकिन न किसी को न समर्थन देंगे न ही किसी से लेंगे यानि ये नया खिलाड़ी ‘न खेलेंगे न ही खेलने देंगे, खेल ही बिगाड़ देंगे’ के ईमानदार फार्मूले से चल रहा है, चाल शातिर है और समझ नहीं पा रहे हैं पुरनियें जो देखते रह जायेंगे अगर ऐसे ही फँसते चले गए तो क्योंकि एक प्रतिशत वोट भी काफी गणित ख़राब कर देता है और एक सीट के चलते तो सरकार भी गिर जाती है। अगर समय पर सौदेबाजी न हो पाए तो। इस बात को समझते भी सभी हैं लेकिन उनको उस तरह खेलने ही नहीं आता जैसा खेल दिल्ली का नया खिलाड़ी खेल रहा है, ये आसान खेल भी नहीं है,सब कुछ दाँव पर लगा कर खेलना पड़ता है, चाहे बच्चों की कसम हो या किसी दिग्गज को हराकर मिली कुर्सी।