अडवाणी का पीएम बनना पक्का


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डॉक्टर मुलायम सिंह यादव ने घोषणा कर दी है कि उनकी पार्टी चूँकि अल्पसंख्यकों की हितैषी है, इसलिए लाल कृष्ण अडवाणी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए पूरा जोर लगा दिया जाएगा,

अडवाणी के घर छन रही भंग की बाल्टी कौन देने जाय।

पार्टी अगर इस बात का विरोध करेगी, तो मुलायम सिंह किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार हैं, भले ही इसके लिए उनको खुद भारतीय जनता पार्टी में शामिल होकर मरते दम तक संघर्ष क्यों न करना पड़े।

बताया जाता है कि इस मुद्दे पर भाजपा की भी बुज़ुर्ग कोर कमेटी में गहन चिन्तन मनन हुआ है और इस बात पर विचार किया गया कि डॉक्टर यादव को अडवाणी के घर छन रही भंग की बाल्टी कौन देने जाय। लगभग प्रधानमंत्री बन चुके नरेन्द्र मोदी की खुमारी में नाचते भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच खुसर-फुसर हो रही है कि ये काम लालजी टंडन कर सकते हैं, क्योंकि उनके ऊपर भांग का असर नहीं हो रहा है, जबकि सबसे अधिक माल उन्होंने ही खींचा था। टंडन जी यूँ तो रिश्ते में मायावती के भाई लगते हैं, लेकिन अडवाणी के लिए वो मुलायम सिंह के साथ खड़े हैं। टंडन जी जन्म से ही नखलउव्वा हैं, उसके अलावा उनका कहीं ठिकाना भी नहीं है, लेकिन इस बार की लहर में उनको घर से ही बेदखल कर दिया गया, जबकि उन्होंने तो कुछ किया भी नहीं था। वैसे किया तो जोशी जी ने भी कुछ नहीं, लेकिन उनको फिर से गंगा के किनारे दूसरे शहर कानपुर भेज दिया गया है, जबरदस्ती।

ऐसे में टंडन साहब जो अटल जी की संसदीय सीट से उनकी तस्वीर लगा कर संसद पहुँच गए थे, बड़े मायूस हो गए हैं और दिल लगा कर नोटा वाला बटन दबा सकते हैं और मुलायम सिंह के प्रोजेक्ट में शामिल हो जाने की पूरी संभावना है। लखनऊ का मिजाज बदल चुका है क्योंकि अटल जी के फोटो की जगह अब गुजरात की खाड़ी से उठी लहर के भरोसे खुद पार्टी अध्यक्ष ने अपने सिटिंग एमपी को बेदखल कर दिया है। पता चला है कि अध्यक्ष जी को ये भी बता दिया गया है कि वो भी प्रधानमंत्री बन सकते हैं, इसलिए लखनऊ से लड़ना ठीक रहेगा वरना गाजियाबाद में तो अबकी धोती सरक जाने का पूरा मौका था, लहर के बावजूद। देश से भ्रष्टाचार मिटाने की जो लहर उठी है, उसमें उत्तराखंड के एक्स सीएम निशंक जी को भी लोकसभा का टिकट मिल गया है, जिनको बदल कर कभी पार्टी ने खंडूरी को कुर्सी सौंपी थी, क्योंकि पार्टी विथ डिफ़रेंस की बात करनी थी, लेकिन कुम्भ के सफल आयोजन में नोबल पुरस्कार से वंचित रह जाने वाले निशंक जी को भाजपा ने उपकृत किया और अब वो धर्म नगरी से संसद जायेंगे। ऐसे में उस इलाके से भी कुछ लोग डॉक्टर मुलायम सिंह जी के प्रोजेक्ट में शामिल हो सकते हैं। जनता की बात मत करिए, क्योंकि वो तो चूतिया ही समझी जाती है और है भी।

आज़ादी से पहले टिहरी रियासत के विरोध में वहाँ तमाम संघर्ष हुए, लोगों ने यातनाएं सहीं। उन अमर क्रांतिकारियों का नाम इस घटिया पोस्ट में लेना भी ठीक नहीं, लेकिन आज़ादी के बाद उसी इलाके के लोगों ने राजपरिवार के लोगों को ही सबसे अधिक बार संसद में भेजा, क्योंकि राजा बदरी नाथ का अवतार होता है। पिछले चुनाव में भी एक ऐसी रानी खड़ी हुईं, जिनकी नागरिकता के बारे में भी संदेह था कि नेपाली ही हैं या हिन्दुस्तानी हो चुकी हैं, लेकिन वो जीत गईं। उसी सीट से निशानेबाज जसपाल राणा भी दावेदार थे, लेकिन उनको मन मसोस कर काँग्रेस में घुस जाना पड़ा, जबकि उनकी सगी बहन राजनाथ जी के सगे बेटे से ब्याही हैं। वहाँ भी तमाम अचूक निशाने लगाने वाला यह खिलाड़ी खाली हाथ रहा, क्योंकि ‘बाहरी’ मुख्यमंत्री बहुगुणा को अपने बेटे में सबसे अधिक गुण दिखाई दिए और राहुल जी के निर्देश के अनुसार उन्हीं को टिकट मिला। नतीजा यह हुआ की जिस महारानी का नाम भी लोगों ने नहीं सुना था वो संसद पहुँच गईं, जो इस बार फिर खड़ी हैं, बताईये जनता कैसे न चूतिया बने, जब धंधा ही यही है सभी दलों का।

अब आप को न समझ में आये तो हम का कहें, आप भी तो जनता ही हैं न? बिहार देख लीजिये, गिरिराज किशोर ने वहाँ पार्टी का झंडा उठाए रखा और सुशील मोदी नितीश बाबू के साथ मलाई काटते रहे, लेकिन टिकट मिला गिरी बाबू को तो नवादा से जहाँ सबसे अधिक वोटर मुसलमान और यादव हैं, मरते क्या न करते? इतना अधिक हर हर कर चुके हैं कि मन मार कर कहना ही पड़ रहा है की मोदी जी के लिए कुछ भी कुर्बान कर सकते हैं। ऐसे में अडवाणी जी को प्रधानमंत्री बनाने की संभावना वाला मुलायम सिंह जी का प्रोजेक्ट सही लगता है, अडवाणी जी सेक्युलर भी हो चुके हैं।

काँग्रेस में भी तमाम पुरनिया नेता जी लोग राहुल गाँधी से डरे हुए हैं, क्योंकि उन सबको लगता है की पार्टी सुधारने के चक्कर में कहीं आम आदमी पार्टी में विलय न करवा दें और फिर पंजे के हाथ में झाड़ू पकड़ा कर अरविन्द को पचास दिन का परधानमंत्री बना दें, तो नेहरू इंदिरा जी से लगायत कलमाड़ी जी के खून पसीने से सनी पार्टी बर्बाद हो जाएगी और निर्माण का मौका हाथ से चला जाएगा। इसी के चलते तमाम पुरनिया नेता कह रहे हैं कि वो सब चुनाव लड़ना नहीं चाहते, जबकि उनमें से बहुतों ने अपने बेटे-बेटियों या बीवियों के लिए टिकट हथिया लिए हैं, फिर भी ये कह कर कि अब वो खुद चुनाव नहीं लड़ना चाहते, एक फ़र्ज़ी माहौल बना रहे हैं। सब के सब राहुल जी को विरोधियों की ही तरह दिल से पप्पू मान लिए हैं और राहुल के पास अब कोई चारा नहीं दिखता। इस बीच, खबर आ रही है कि राहुल जी खुद अरविंद के साथ डीलिंग कर रहे हैं कि अगर उनको सम्मान मिले और मजाक न उड़ाया जाय, तो खुद आम आदमी पार्टी में शामिल हो सकते हैं, क्योंकि राहुल हर मंच पर केजरीवाल के ही एजेंडे की बात करते रहे हैं। विलेज सफारी से लेकर रिक्शे वालों, कुलियों और मजदूरों के बीच जा रहे हैं। इस बीच कभी ये भी नहीं कहा की जब कुलियों से मिल कर घर आये तो रात मम्मी कमरे में आईं और रोते हुए बोलीं की इस जहर के चक्कर में तुम क्यों कुली कबाड़ियों के बीच में उठने बैठने लगे, हेल्थ का क्या होगा, हाईजीन का भी ध्यान क्यों नहीं रखते। राहुल से नाराज़ कांग्रेसियों ने भी डॉक्टर मुलायम सिंह के प्रोजेक्ट से सहमति जताई है और कहा है कि प्रधानमंत्री तो अडवाणी को ही बनाना चाहिए, क्योंकि अब उनको देख कर लगता है कि कुछ कर ही नहीं सकते, इसलिए मनमोहन सिंह के सही रिप्लेसमेंट वही लगते हैं। अडवाणी जी खुद मनमोहन सिंह की ही तरह आज़ादी के वक्त सरहद के उस पार से आये थे और अब बिना प्रधानमंत्री बने ही मनमोहन की गति को प्राप्त हो चुके हैं।

हालाँकि, दिग्विजय सिंह भी इस प्रोजेक्ट से जुड़ना चाहते थे, लेकिन जिस कदर उन्होंने मध्य प्रदेश में पार्टी को घाट लगा दिया और उसके बाद जब यूपी के प्रभारी बने तब काँग्रेस को गायब ही करवा दिया था, विधानसभा में अमेठी-रायबरेली में भी धूल चाटना पड़ा था, उससे लोग सहम रहे हैं। यूपी लुटाने के बाद दिग्विजय सिंह को आंध्र प्रदेश का प्रभारी बनाया गया था और उन्होंने जितनी खूबसूरती से आंध्र और तेलंगाना का मसला ख़राब किया, उससे किसी को शंका नहीं होनी चाहिए कि जो पहले कहा जाता था कि ये राहुल गाँधी के राजनैतिक गुरु हैं, हंड्रेड परसेंट सही बात रही होगी, वरना राहुल जी खुद तो एक समझदार खानदान से आते हैं। इस प्रोजेक्ट में राघोगढ़ के राजा को इसलिए ही जगह नहीं मिल रही है कि कहीं वो काम तो करें। अडवाणी जी के नाम पर और प्रधानमंत्री बनवा दें माया बहिन जी को, उनका कोई ठीक नहीं। जो लोग राजनीति के बारे में जानते हैं, उन्हें शायद पता होगा कि उमा भारती के अन्दर के नेता को सबसे पहले उन्होंने ही परखा था, लेकिन अपने गाँव से दिल्ली काँग्रेस आलाकमान से मिलने जाने के बीच में वो चढ़ गईं राजमाता सिंधिया के हत्थे और देखिये कहाँ से कहाँ पहुँच गईं। हाँ, अरविंद केजरीवाल का भी साथ लिया जा सकता है, क्योंकि इस मिशन में साझा दुश्मन से मिलकर लड़ने की बात हो रही है और केजरीवाल ने भी देश के सामने बहुत बड़ा खुलासा कर दिया है की दो हफ्ते से अधिक की खाँसी टीबी ही हो जाए ये कोई जरूरी बात नहीं, इसलिए उनपर लोगों का भरोसा बढ़ गया है।

इस बारे में मुलायम सिंह ने एक शंका जरूर व्यक्त की है कि अगर हम लोग अडवाणी जी को प्रधानमंत्री बनाने की राह में चलें तो कौन गारंटी लेगा कि केजरीवाल बीच में ही भाग न जाएँ और कहने लगें कि ये आदमी तो बहुत दिन से राष्ट्रपति बनने का गेम खेल रहा है, जी अंदर ही अंदर। इसलिए चलो राष्ट्रपति ही बना दिया जाय और जरूरत पड़े तो जिन्ना की मज़ार पर चल कर पाकिस्तान आम आदमी पार्टी के साथ अनशन किया जाय। वहाँ खूब भीड़ जुटेगी, क्योंकि सिंध प्रान्त को लेकर आजकल वहाँ खूब धरने हो रहे हैं। सारे सिन्धी जुट जायेंगे और हमारा प्रेशर भी वोटरों पर बढेगा। चूँकि केजरीवाल जी को सब खबर रहती ही है, इसलिए बस इसी शंका के चलते उनको मिशन अडवाणी से थोड़ा दूर रखा जा रहा है।

इस बीच, देश दुनिया के इतिहास-भूगोल पर तगड़ी पकड़ रखने वाले, जरुरत के हिसाब से खुद का भी गढ़ लेने वाले लगभग प्रधानमंत्री मोदी जी को इस मिशन की खबर मिली है तो उन्होंने लापता गंज की रैली में दहाड़ते हुए कहा की – “लहर हूँ, तूफ़ान हूँ, सुनामी हूँ और इस समय तो देश में सबकुछ गुजरात में ही बढ़िया नस्ल का मिलता है। देश को चौकीदार की जरूरत है, जब सब कुछ गुजरात में हो सकता है तो देश का चौकीदार क्यों नहीं ? अडवाणी क्या चीज होता है? हमारे पास तो अडाणी है, अम्बानी है। टीवी देखो या केजरीवाल से ही पूछ लो, प्रधानमंत्री के देश के विज्ञापनों की फसल लहलहा रही है। किसी लाल की माई में दम नहीं जो अब इस सुनामी को थाम सके, भरोसा न हो तो अडवाणी से ही पूछ लो।“ लेकिन अडवाणी जी को मनाने वाली टीम हारने वाली नहीं है, कहने वाले तो कुछ भी कह सकते हैं। वैसे भी आजकल होली का माहौल है। होशोहवास में ही लिखा होगा चिरकिन ने जो तमाम भक्तों को समर्पित है, बाकि जनता तो जो है, सो हईये है – ‘उनके तो पाद में भी आती है ख़ुशबू, शायद वो इत्र से आबदस्त लिया करते हैं।’