विशेषः एयरलिफ्ट का एयरलिफ्ट


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सिनेमा को सिनेमा की ही तरह देखना चाहिए, लेकिन कई बार प्रमोशन के दौरान प्रोडक्शन कंपनी इस तरह के आक्रामक अभियान शुरू करती है कि लोग पहले से ही एक धारणा बनाने लग जाते हैं। प्रचारित की जा रही कहानी के साथ हीरो की भी बड़ी भूमिका रहती है अपने देश में, एयरलिफ्ट की मार्केटिंग भी काफी आक्रामक ढंग से हुई।

जी हाँ, मार्केटिंग किस लेवल की हो रही है, उसी पर आज बहुत कुछ निर्भर है। फिल्मों की बात करें तो उनके लिए भी अब मामला बस एक या फिर दो हफ्तों का ही होता है, जिसमें अधिक से अधिक दर्शकों को खींच सकें। एक साथ ढेर सारे प्रिंट रिलीज करना और मल्टीप्लेक्स में भीड़ जुटा लेना, इसी की लड़ाई है। और लड़ाई वही जीतता है, जिसके पास कहानी और स्टारकास्ट के अलावा मार्केटिंग के दौरान कुछ यूनिक देने का नजरिया हो।

एयरलिफ्ट एक यूनिक फिल्म है इस मायने में कि अभी तक खूबसूरत विदेशी लोकेशन दिखा कर देशी दर्शकों को मोहने वाले या फिर देश की गायब होती सांस्कृतिक परम्पराओं को सिनेमा में ढाल कर विदेशों में बसे भारतीयों के बीच उतारने वाले बॉलीवुड से विदेशों में बसे भारतीयों पर अचानक आ जाने वाली मुसीबत को बड़े परदे पर उतारा गया और लोगों ने इसे पसंद भी किया। हालांकि, प्रमोशन के दौरान बहुत जोर-शोर से वास्तविक घटना पर आधारित बताया गया।

अक्षय कुमार तो वैसे भी दर्शकों के एक बड़े वर्ग के लिए धीरे-धीरे मनोज ‘भारत’ कुमार का अपग्रेडेड वर्जन बनते जा रहे हैं। उनकी ‘बेबी’ पूरी फिल्म थी, लेकिन उसकी कहानी और उसका ट्रीटमेंट तमाम दर्शकों के दिल के करीब था ऐसे में वही अक्षय वास्तविक घटना पर आधारित सिनेमा बना दिए जबकि भारत में अभी तक वास्तविक घटनाओं पर डाक्यूमेंट्री बना करती हैं। अगर आज रिलीज होते ही कोई भी फिल्म देश के किसी कस्बे में मात्र दस रूरुपये में पेन ड्राइव या फोन के मेमोरी कार्ड में ली जा सकती है, तो उसी टेक्नोलॉजी के सहारे रिलीज के पहले माहौल भी बनाया जा सकता है।

एयरलिफ्ट का भी माहौल बाजीराव के उतरने के साथ ही शुरू हो चुका था, अगर आप देशभक्त हैं तो यह फिल्म जरूर देखें टाइप का। एक ऐसे आदमी की कहानी जिसने अपने दम पर एक लाख सत्तर हजार भारतीयों को कुवैत से निकाला, लेकिन जिससे देश अंजान बना हुआ है। ऐतिहासिक घटनाओं पर सिनेमा बनाने में हम कहीं नहीं हैं। अलबत्ता अब सिनेमा से इतिहास बनाने की कोशिश हो रही है, सत्य घटनाओं पर आधारित टाइप का डिस्क्लेमर देकर। हालाँकि, प्रचार के इस तरीके के बावजूद एयरलिफ्ट से एक अच्छी फिल्म का तमगा नहीं छीना जा सकता।

अब चूँकि आप किसी अखबार की समीक्षा नहीं पढ़ रहे हैं। इस नाते ब्लॉग में मिलने वाली छूट का लाभ लेते हुए सिनेमा के साथ–साथ ‘वास्तविक घटना’ पर भी बात होती रहेगी। सिनेमा कसा हुआ है, सभी पात्र कहीं भी ओवर एक्टिंग करने की कोशिश नहीं कर रहे हैं। न ही कहीं बिना वजह लाउड हैं, तो एकदम डाक्यूमेंट्री स्टाइल में ही बड़े परदे पर हम देख रहे हैं। हाँ, बम्बइया फिल्मों में गाने डालने का आधार खोजने की जरूरत नहीं। हम दशरथ मांझी के भी प्रणय दृश्य देख ही चुके हैं, तो इस मामले को पास कर देते हैं। ओपनिंग सीन एक तारीख के साथ शुरू हुआ है, 1 अगस्त 1990 को दसमान पैलेस में जिसमें रंजीत कात्याल अपने हाईप्रोफाइल दोस्तों के साथ हैं। फिर जब वह पत्नी के साथ गाड़ी में दिखता है तो अपने ड्राइवर नायर के बेटी के साथ इण्डिया जाने की बात पर उससे कहता है कि ले जा, अभी चार साल की है, उससे वहां कोई घूस भी नहीं मांगेगा। यानी एक आम भारतीय से लेकर एनआरआई तक के बीच देश का जो खाका है उसी से फिल्म शुरू होती है।

रंजीत कंस्ट्रक्शन के फील्ड का बड़ा खिलाड़ी है जो खुद को भारतीय की जगह कुवैती मानता है। देर रात उसे फोन आता है कि कुवैत पर सद्दाम हुसैन का हमला हो गया है, जिसका मूल कारण तेल है। वैसे तेल आजकल मुद्दा बन रहा है। हमला हो गया, कुवैत में अफरा-तफरी है, रंजीत का ड्राइवर मार दिया जाता है और उसे उसी दसमान पैलेस में ले जाया जाता है जो ओपनिंग सीन में था। यहाँ उसकी मुलाक़ात इराकी रिपब्लिकन आर्मी के कमांडर खलफ बिन जायद से होती है जिस रोल में इनामुल हक़ हैं। अफसर रंजीत के बगदाद दौरे पर उसके साथ दो दिन रह चुका है इस नाते उसे ही नहीं उसकी बीबी का भी नाम याद रखता है और फिर सुरक्षित निकलने के बदले पैसे वाली बारगेनिंग होती है। रंजीत परिवार के साथ ही नहीं निकलना चाहता, मृत ड्राइवर की पत्नी और बेटी को भी निकालना है।


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वास्तविक घटना की बात करें तो उस साल एक अगस्त को जेद्दा में कुवैत और इराक की वार्ता असफल हो चुकी थी। जुलाई में बगदाद में अमेरिकन राजदूत एप्रिल ने सद्दाम से वायदा किया था कि कुवैत के साथ उनका आपसी मामला वही निपटाएं, अमेरिका से कोई लेना देना नहीं। साथ ही सद्दाम ने ईरानी क्रांति को अरब में फैलने से रोका था यानी शिया क्रान्ति जिस कारण अरब की दुनिया भी उन पर लहालोट थी। अमेरिका और फ्रांस से तकनीक मिल रही थी तो अरब देशों से भी अच्छा लोन मिला था।

सद्दाम ने कुवैत पर तेल चोरी का आरोप लगाया था। साथ ही अपना कर्जा वापस मांग रहा था। कुवैत को भी पश्चिम का सह मिल रहा था कि अपने स्टैंड से पीछे मत हटना। यानी डबल क्रास हो रहा था, जिससे बेखबर सद्दाम ने हमला कर दिया यह सोच के कि अमेरिका का इससे कोई लेना देना नहीं।


सद्दाम हुसैन

खैर सिनेमा की बात, इराकी अफसर रंजीत का दोस्त हो जाता है और खुद को न पहचान पाने के बारे में एक संवाद उछालता है कि ‘तुम्हारी कोई गलती नहीं, सक्सेसफुल लोगों को सिर्फ इम्पोर्टेंट लोग ही याद रहने चाहिए और आज मैं अचानक इम्पोर्टेंट हूँ।‘ जिन लोगों ने हॉलीवुड की फिल्म होटल रवांडा देखी हो उन्हें सीन कुछ-कुछ मिलते नजर आयेंगे, क्योंकि अनुमान हो रहा है कि आगे फिल्म ऐसे ही बढ़ेगी। रंजीत को इराकी आर्मी की तरफ से जारी वीआईपी स्टीकर मिल जाता है, क्योंकि कुवैत को इराक बनाए रखने में ऐसे लोगों की जरूरत है।

हीरो एम्बेसी में जाता है जहाँ एकलौता आदमी उसे बताता है कि सारे लोग चले गए, हीरो गुस्से में कहता है कि इण्डिया गवर्नमेंट एज यूजुअल तमाशा देख रही होगी। ऐसे संवाद भी नायकत्व में चार चाँद लगाते हैं साथ ही पब्लिक भी समझती है कि हाँ, ऐसा ही तो होता है, सरकार मतलब कुछ नहीं। सरकार बनाने के पहले वाले केजरीवाल और उनके अन्ना गुरु वाल्ली क्रान्ति सबके भीतर थोड़ी-थोड़ी रहती ही है। अगर यहीं हम कह दें कि सिनेमा में बतायी गयी टाइमलाइन के हिसाब से जिस समय रंजीत कात्याल कुवैत की खाली पड़ी इन्डियन एम्बेसी में लेक्चर दे रहा था उसी वक्त भारत के विदेश मंत्री दुनिया भर की मीडिया को अचरज में डालते हुए बगदाद पहुँच चुके थे, सद्दाम ने उनको गले लगाया था और उस तस्वीर को पश्चिम की मीडिया ने बड़ी लानत भेजी थी लेकिन दुनिया की लाइन से अलग भारत सरकार कुवैत की आज़ादी नहीं वरन वहां और अगल बगल फंसे भारतीयों को सुरक्षित निकालने पर ध्यान केन्द्रित कर चुकी थी।

वास्तविक घटनाओं पर आधारित कहानी का ठप्पा लगाने से पहले यह भी सोच लेना चाहिए कि हम इसमें देश को बदनाम न करें, देश किसी पार्टी का नहीं होता। पता नहीं कैसे विदेश मंत्री की इतनी बेहूदी इमेज दिखाए जाने के बाद भी फिल्म पास हो गयी, यह भी राष्ट्रभक्ति का पतन है। कांग्रेस पार्टी का भी कोई वास्ता नहीं, क्योंकि तब सरकार उसकी भी नहीं थी। इन सब के बावजूद फिल्म में सिनेमा फैक्टर कमजोर नहीं है, पूरा सिनेमा है जो बढ़िया है।

रंजीत का संवाद कि अब ‘अमेरिका कुवैत की हालत दिखा कर इलाके में पैर जमा लेगा और हमारी यहाँ पहचान है तो बस हम हिन्दुस्तानी हैं’ जमता है। इब्राहिम के रोल में पूरब कोहली भी जमे हैं जिनका संवाद भी सही है कि ‘दिल्ली को भी क्या कोसना, यहाँ कितने हैं जिनकी गिनती में दिल्ली थी नहीं, कुवैती समझने लगे थे सब खुद को’, यह याद दिलाने के लिए काफी है कि बुरे वक्त में अपने ही काम आते हैं। रंजीत की बीवी के रूप में निम्रत कौर भी रह रहकर कहीं-कहीं निखर पड़ती हैं। बाकी वास्तविक घटना के नाम पर सिनेमा के अंत में जिन मैथ्यू साहब को भी याद किया गया है, वैसे लोग रहे होंगे इंकार नहीं। सन्नी मैथ्यू टोयोटा के सेल्स मैनेजर थे, जिन्होंने अपने स्तर पर काफी मदद की थी।

एक टायकून से पहले अपने कर्मचारियों और फिर सारे हिन्दुस्तानियों की चिंता करने लगे रंजीत को दिल्ली में विदेश मंत्रालय के कुछ नंबर मिलते हैं, जिन्हें लगाने पर कई फोन उठते नहीं हैं, फोन बजता देख कर भी बाबू लोग अपनी घड़ी देखते हैं और चल निकलते हैं। रंजीत लोगों को बचाने की सोच रहे हैं और सरकार एकदम लापरवाह है, रंजीत का फोन उठता भी है, तो उस बाबू जॉइंट डायरेक्टर कोहली के पास जो गल्फ डेस्क देखता ही नहीं, लेकिन फिर वही रंजीत का सहायक बनता है और पहले तो नकारता है फिर धीरे-धीरे सारे लोगों को निकाल लाने में मदद करता है।

कोहली विदेशी मंत्री से कई असफल कोशिशों के बाद मिलता है, लेकिन मंत्री जी कहते हैं कि कुवैत हमारी प्राथमिकता नहीं है। हमारी सरकार स्थिर नहीं है, तुम लोगों की नौकरी परमानेंट है, तुम ही कुछ उपाय निकालो। सत्य घटना पर आधारित कही जा रही फिल्म का यह भी एक शर्मनाक सीन है, जो तंत्र और सरकार में भेद पैदा करता है, साथ ही दर्शकों को और भ्रमित करता है। सुपर हिट जा रही इस फिल्म में दिखाए गए हालात के हिसाब से तो अगर कसौटी पर देखें तो जो सरकार ने किया था वह कल्पना से भी परे है। दो अगस्त को हमला हुआ था, इलाके के भारतीयों में भगदड़ मच गयी, कुवैत के लोग इराक के रास्ते जार्डन निकलने लगे, क्योंकि ईराक से उड़ानें प्रतिबंधित हो चुकी थीं।


कुवैत पर इराकी हमले के बाद लोग जॉर्डन जाते हुए

हाँ, गुजराल साहब के प्लेन से जरूर कुछ भारतीय निकलने में कामयाब हुए थे, लेकिन जब वायु सेना का वह जहाज दिल्ली उतरा तो उसे मीडिया ने ‘मिलिनियर्स फ्लाइट’ कहा था, क्योंकि उसमें चंद अमीर लोग थे जो जगह पा सके थे। हीरो रंजीत को बगदाद की इन्डियन एम्बेसी में इराकी बिस्कुट मिलता है और कोई भरोसा नहीं। फिर वह अपने दम पर दिल्ली कोहली से बात करके जार्डन का बोर्डर खुलवाता है और हजारों की भीड़ लेकर रोड पर निकल पड़ता है। रास्ते में केवल चार इराकी सैनिक दिखते हैं जो हीरो की गाड़ी में बैठी कुवैती महिला का पासपोर्ट मांगते हैं तो हीरो अकेले उन सैनिकों से भिड़ जाता है और साथ आ जाती हीरो के साथ जा रही जनता।


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सैनिक बेबस हो जाते हैं, हम सिनेमा तो अच्छा बना लेते हैं लेकिन उसमें थोड़ा बहुत बम्बई रह ही जाता है और उसके बगैर दर्शकों को जमेगा भी नहीं, ऊपर से यह फिल्म गणतंत्र दिवस की भेंट है, भारत माता की जय। जार्डन की इन्डियन एम्बेसी में भी पहले इन लोगों की तरफ ध्यान नहीं दिया जाता है फिर दिल्ली से फोन आता है और वहां तिरंगा खड़ा हो जाता है, लोगों में ख़ुशी की लहर दौड़ जाती है।

एयर इण्डिया के लोग भी शुरूआती तकझक के बाद तैयार हो चुके हैं, एवैकुएशन फ्लाइट्स के लिए। उड़ानें शुरू हो जाती हैं और हीरो रंजीत सबसे अंत वाली फ्लाइट से अपने परिवार के साथ वापस आता है। एक अच्छी फिल्म खत्म हो जाती है, लेकिन इसमें घुसा बम्बई और नायक गढ़ने का कीड़ा कुछ लोगों को तो हजम नहीं ही होगा, लेकिन यह भी सच है कि फ़िल्में ऐसे लोगों के बारे में सोच कर बनती भी नहीं।


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सत्य घटना पर आधारित फिल्म में सबको निकालने के बाद अंतिम फ्लाइट से हीरो वापस इण्डिया आता है जो हमला शुरू होते ही अपनी बीवी और बेटी को लंदन निकल जाने को बोल रहा था, लेकिन अगर यह भी दिखा दिया जाता कि मिशन पर 12 अगस्त को एयर इण्डिया की जो पहली फ्लाइट गयी थी, उसमें सिविल एविएशन मिनिस्टर आरिफ मोहम्मद खान भी गए थे, तो क्या फिल्म कमजोर हो जाती? खैर जो भी स्क्रिप्ट मिली उसको अक्षय ने बहुत कायदे से जिया, अपनी सफ़ेद दाढ़ी दिखाने से भी उन्होंने परहेज नहीं किया।


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लेकिन उस दौर में जार्डन के राजदूत रहे के गजेन्द्र सिंह ने आज से दस बारह साल पहले अपने संस्मरण में लिखा था कि कुवैत के काफी संपन्न भारतीय इराक से जार्डन के बीच के रास्ते पर बने शालान कैम्प में अपने सहकर्मियों और कर्मचारियों के साथ खाने और पानी को साझा करने के मुद्दे पर लड़ रहे थे, सउदिया और बहरीन के संपन्न भारतीय दिल खोल के शरणार्थियों की मदद कर रहे थे, तो वहीं जार्डन में एक काफी संपन्न परिवार ने एक वैन देने की रिक्वेस्ट ठुकरा दिया। कंस्ट्रक्शन के फील्ड के एक भारतीय महारथी से उनका खाली पड़ा वेयर हाउस माँगा गया, तो उन्होंने नकार दिया। गजेन्द्र सिंह लिखते हैं कि कुवैत और ईराक से चुपचाप आने वाले रिफ्यूजी जार्डन पहुँचते ही चिल्लाने लगते थे और दूतावास की गाड़ियों में भी तोड़फोड़ कर दिए थे, जिनपर नियंत्रण के लिए पुलिस लगी थी।

दूतावास के बारे में उन्होंने लिखा था कि आधे स्टाफ चाय बनाने और खाना लाने के काम में लगे हुए थे। लगातार ड्यूटी से थकान तो सबको थी, लेकिन कुछ को तो बुखार भी हो चुका था फिर भी सभी कर्मचारी दिन-रात एक करके लगे हुए थे कि जल्दी से जल्दी सभी लोगों को वापस वतन भेजा जाए। उन्होंने लिखा है कि जार्डन आने वाला पहला बैच उन हाजियों का था, जो नजफ़ और कर्बला में आकर फंस गए, क्योंकि ईराक से उड़ानें बंद थीं। इस बैच को निकालने के बाद तो फिर एयर इण्डिया ने जो उड़ानें शुरू की वह गिनीज बुक में दर्ज है।

तो सिनेमा अपनी जगह, इतिहास अपनी जगह। सोचिये सिनेमा ही आजकल लोगों को शिक्षित करने के काम आता है। बाजीराव मस्तानी के बाद अब रंजीत कात्याल की कथा है। फिल्म ठीक है, जिसमें वास्तविकता तलाशना उन लोगों के साथ नाइंसाफी होगी, जिनके जमाने में ट्विटर नहीं था और न ही वो किसी ऐसी पार्टी के थे, जो चुनावों में उनको भुनाती। साथ ही सरकार पर इतना अविश्वास भी नहीं होना चाहिए कि एक अकेले आदमी ने इतना बड़ा तीर मार लिया, क्योंकि सरकार की प्राथमिकता कुवैत नहीं था।

समझिये भाई सिनेमा तो सिनेमा होता है, सरकारें भी आती-जाती रहती हैं, लेकिन एक तंत्र है जो देश को चलाता रहता है। हाँ, उसमें तमाम लोगों का व्यक्तिगत सहयोग भी होता है, लेकिन किसी के भी कद को वास्तविक बता कर फिल्माने में जो वास्तविक हैं, उनके साथ अन्याय तो नहीं करना चाहिए न? बाकी फिल्म अच्छी है, नहीं देखे हैं तो देख सकते हैं, सिनेमा की तरह।