शिव हों या केशव, ईष्ट एक ही होना चाहिए!

एको देव: केशवो वा शिवो वा
ह्येकं मित्रं भूपतिर्वा यतिर्वा ।।
एको वास: पत्तने वा वने वा
ह्येकं भार्या सुन्दरी वा दरी वा।।

भावार्थः एक ही देवता की अराधना करनी चाहिए, भगवान कृष्ण या शंकर की, एक ही मित्र बनाना चाहिए राजा हो या तपस्वी, एक ही जगह रहना चाहिए नगर में या वन में और एक से ही विलास करना चाहिए सुन्दरी से या कन्दरा से।

*नीतिशतकम् का यह श्लोक आज भी प्रासंगिक है। इसे वर्तमान परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। सुख और दुःख से भरे इस संसार में मनुष्य को अपनी कामनाओं की सीमा को समझ जाना चाहिए। सनातन धर्म ईरश्वर को निराकार कहा गया है और साधारण मनुष्य के लिए निराकार रूप का ध्यान कठिन होता। इसलिए, ऋषि-मुनियों ने ईश्वर के रूप की परिकल्पना की, ताकि मनुष्य सहजता से उनका ध्यान कर सकें। ध्यान का उद्येश्य निराकार परमपिता परमात्मा से संपर्क का है, इसलिए किसी एक रूप के प्रति भक्ति की चरमसीमा ही आपको निराकार से मिला सकती है। इसलिए कहा गया है कि एक ही देवता की अराधना करें। ठीक इसी तरह हमारे आसपास मित्र के रूप में कई लोग उपस्थित होते हैं, लेकिन उनमें एक ही काम का होता है। मित्रता का भ्रम नहीं पालना उचित है। ऐसे ही, किसी एक ही स्थान पर अपने बसेरा बनाना चाहिए। धन की अधिकता की वजह से लोग देश-दुनिया में मकान बना तो लेते हैं, लेकिन उसके बाद इसके देखरेख को लेकर मानसिक पीड़ा में रहते हैं। ठीक इसी तरह एक से अधिक पत्नी या विवाहेत्तर संबंध में व्यक्ति मानसिक अशांति में रहता है। कुल मिलाकर श्लोक का अभिप्राय है एक देवता, एक मित्र, एक स्थान व एक भार्या से संतुष्ट रहने वाले व्यक्ति जीवन में सुखी रहते हैं।

*नीतिशतकम् : भर्तृहरि द्वारा लिखित नीतिशतकम् के श्लोक संस्कृत विद्वानों द्वारा ही नहीं, अपित सभी भारतीय भाषाओं में समय-समय पर सूक्ति के रूप में उद्धृत किए जाते रहे हैं। इसमें भर्तृहरि ने लोक व्यवहार पर आश्रित नीति सम्बन्धी श्लोकों का संग्रह किया है। एक तरफ उन्होंने अज्ञता, लोभ, धन, दुर्जनता, अहंकार सरीखे दुर्गुनों की निन्दा की है, तो दूसरी तरफ विद्या, सज्जनता, उदारता, स्वाभिमान, सहनशीलता, सत्य गुणों की प्रशंसा भी की है।

जीवन में ‘एक’ की बड़ी महत्ता है। सच ही कहा गया है कि मिलना आखिरकार मिलना निराकार में ही है, हालांकि सहजता के लिए एक ईश्वर के एक रूप का ध्यान करते हुए आगे बढ़ना चाहिए। यह रूप कोई भी हो सकता है। राम, कृष्ण, शिव या कोई और। भर्तृहरि अपने समय के प्रकांड विद्वान ऋषि रहे हैं। उनकी सूक्तियां आने वाले युगों युगों तक प्रासंगिक रहेंगी।