प्रियंका गाँधी वाड्रा का शो


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इलाहाबादी कश्मीरी ,चचा जस्टिस काटजू ने ट्वीट किया है कि ‘प्रियंकवा चमके क बहुत कोशिश करत बा पर कर न पाई’ यानी प्रियंका वाड्रा चमकने की बहुत कोशिश कर रही हैं लेकिन उनसे हो नहीं पायेगा।चाचा प्रयागराज के वासी हैं,जहाँ संगम के साथ ही आनंद भवन भी है,काँग्रेस का पुण्य तीर्थ साथ ही वहीं फ़िरोज़ गाँधी की भी कब्र है। फ़िरोज़ गाँधी मतलब दुनिया के अनोखे इंसान जिनके ससुर प्रधानमंत्री रहे,पत्नी प्रधानमंत्री रहीं,बेटे को भी वही कुर्सी मिली और बहु भी सत्ता के शिखर पर रहीं।ताज़े वाले भैया बहिनी अपने दादा जी का नाम भी नहीं लेते।
बताइये भला जिस देश में ‘तू जानता नहीं मैं कौन हूँ!’ वाली जबरदस्त संस्कृति है,जहाँ प्रियंका गाँधी बस इसलिए मीडिया स्पेस लूट ले जाती हैं कि उनकी नाक इंदिरा जी से मिलती है,हालाँकि इस पर भी बहस चलती है कि उन्होंने अपनी नाक बाद में वैसी करवाई है,उस देश में फ़िरोज़ गाँधी का कोई नाम लेवा नहीं ?लगता है कि अब भाजपाइयों को ही फ़िरोज़ गाँधी के नाम पर कुछ करना चाहिए।आखिर वो देश के शायद इकलौते ऐसे सांसद होंगे जो संसद में अपनी ही पार्टी के भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़े रहते थे,भले ही सगे ससुर जी प्रधानमंत्री हों।यह अलग बात है कि यह असल व्हिसिलब्लोअर बाद में इलाहाबाद की सड़कों पर नशे की हालत में दिख जाता था,और दिल्ली में भी ठिकाने कहीं और होते थे,प्रधानमंत्री आवास नहीं।
छोड़िये इस दुःख भरी दास्तान पर फिर कभी चर्चा होगी,अभी बात दूसरी है। रॉबर्ट जी को ईडी का बुलावा मिलने की खबर आने से पहले ही प्रियंका जी को यूपी ईस्ट का महासचिव बना दिया गया वह भी तब जब जो विदेश थीं,शायद यह पद भी पहली बार बना होगा।ईस्ट यानी उत्तर प्रदेश का वही इलाका जिधर अमेठी -रायबरेली है।विधानसभा चुनावों में तो वो उधर जाती रही हैं,डेरा डालने और पार्टी के एकाध विधायक जीतते भी रहे हैं। पिछले लोकसभा चुनाव के समय बनारस के काँग्रेस प्रत्याशी की तमाम खूबियों में से एक बात अखबारों में जोर शोर से आती थी की वो प्रियंका जी की पसंद हैं और उनकी डाइरेक्ट बात होती है,साफ़ है कि बिना कोई पद मिले ही उनका पूरा प्रभाव था ।
तो अब जबकि महासचिव ईस्ट बन गयी हैं तो यूपी में काँग्रेस का सूरज निकलेगा या फिर दक्खिन ही लगी रहेगी ?या यह भाजपा कम सपा-बसपा पर कुछ सीटें छोड़ने के लिए खेला गया दाँव है?याद रहे की प्रधानमंत्री बनाने में यूपी की सीटों की अहम् भूमिका है,गठबंधन में इस पद की भी मारामारी है ही।तो मित्रों क्या सोचते हैं आप चाचा काटजू सही हैं या मिसेज वाड्रा की एंट्री को ब्रह्मास्त्र और ट्रंपकार्ड बता रहे लोग?लोकतंत्र के हित में आपकी विटनेस भी जरूरी है,बोलिये -बोलिये !