भारतीय मीडिया में पाखंड (हिप्पोक्रेसी) का सबसे बड़ा उदाहरण क्या है?


#1

अब वे दिन लद गए, जब मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहा जाता था। सोशल मीडिया के इस दौर में अब सब जान गए हैं कि भारतीय मीडिया तटस्थ नहीं है। सोशल मीडिया साइट्स पर तैर रहे बहुत ही क्रांतिकारी विडियो से लेकर अपने राजनीतिक आकाओं का पक्ष लेने वाले विडियोज आज बड़ी संख्या में मौजूद हैं। ऐसे तमाम उदाहरण मौजूद हैं जिससे यह तय है कि लगभग सभी मीडिया हाउस अलग-अलग राजनीतिक दलों के भोंपू के रूप में काम कर रहे हैं।

इसी क्रम में हम उस विडियो को नहीं भूल सकते, जिसमें वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपेयी एक रिपोर्ट को आम आदमी पार्टी के समर्थन में फिक्स करते नजर आ रहे हैं। इस विडियो में आप प्रमुख अरविन्द केजरीवाल उन्हें समझाते नजर आ रहे हैं कि उन्हें कैसे अपनी बात रखनी चाहिए।

यह बस एक वाकया है।

रिपोर्टिंग पीछे छूट गई। कुल मिलाकर भारत में मीडिया का मतलब प्रपंच और पाखंड ही रह गया है। हम इस थ्रेड के माध्यम से यह जानना चाहते हैं कि भारतीय मीडिया में पाखंड (हिप्पोक्रेसी) का सबसे बड़ा उदाहरण क्या है? आइए इस पर चर्चा करें।


#2

सबको अपनी पड़ी है और पत्रकार आजकल नेताओं की कठपुतली बन चुके हैं. अब देखना है ये नया क्या गुल खिलाते हैं!


#3

अगर पत्रकारिता की बात करें तो यह शख्श उदहारण नहीं बल्कि नमूना बन चुका है। न्यूज़रूम से सीधा राजनीति के गलियारों में छलांग लगाकर फिर से satyahindi[dot]com नाम का समाचार पोर्टल चलाने वाले आशुतोष की असलियत यहाँ देखें।


#4

रवीश से पुण्य प्रसून और विनोद दुआ तक और आशुतोष से लेकर अभिसार शर्मा तक एक से एक शर्मनाक लोग बैठे हैं। ये पाखंड के साथ प्रपंच रचते हैं।


#5

नेता की तरह पत्रकार भी हमारे ही बीच के ही लोग होते हैं । अब ये सब लोगो का अलग अलग गाँव तो होता नहीं इसलिए मुझे लगता है पूरा का पूरा गाँव ही पाखंडी है । कुछ गाँव वालो को ये खबर ही नहीं है की उनका पूरा गाँव पाखंडी हो चूका है ।


#6

सही बात है। कुएं में ही भांग है और पूरा गांव ही पाखंडी है।