संगीत की पसंद-नापसंद आस्था सरीखी होती है


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सुकून के लिए पुराना डब्बे वाला रेडियो ही काफी है…

उस पर भी वो कार्यक्रम जिसपे आप का काबू न हो… एक टच पे कौनो भी गाना बजा देने वाले युग मे भी मनोहरा सूरत से बम्बई के विविध भारती स्टूडियो में फोन करके उंगली में अँगूठी की फरमाइश इसलिए नहीं करता कि उसे एक टच से वो गाना बजाने नहीं आता… आता है… पर मनोहरा पाँच सौ मील दूर उसकी यादों में दिन रात करती उसके बच्चों को स्कूल के लिए तैयार करती अतवारिया के लिए गुजरात से लेकर बंगाल तक जम्मू से लेकर केरल तक फ़िज़ाओं में एक धुन छेड़ता है… कि तेरे बिन एक भी दिन मुश्किल हो गया जीना-जीना-जीना…

मनोहरा के लिए गीत उद्यम-हँसी-ठठोली-प्रेम का बिम्ब है… दुखों को सहने की शक्ति है, आशा का अनुलंबन है… मनोहरा संगीत के उन प्रेमियों में से नहीं है जिसको राग-लय-छंद-ऊपर-नीचे-पिच आदि से कोई लेना देना हो… पर मनोहरा का मिजाज अपने पसंद का गाना सुन के सुर-ताल में आ जाता है… उसका काम मे मन लग जाता है… क्या इतना ही काफी नहीं है… क्या धुन की सच्ची उपादेयता ये नहीं है?

बिल्कुल है…

रेडियो पे बजने वाले संगीत का जीवन दर्शन से एक विशेष संबंध है… हम अपने जीवन मे सारी चीजें अपने मन की करने/कराने में परेशान रहते हैं, और यही कारण है कि जीवन के मूल तत्व से हमारी विरक्ति हो जाती है… कुछ सृष्टि पर भी छोड़ो… सृष्टि ही सबसे बड़ी आयोजक है, वन टच के म्यूजिक पे अमल ठीक है, पर इतना विश्वास नहीं कि मैंने जो गाना बजाया है वही ठीक है… कभी कभी समय पे भी चीजें छोड़नी पड़ती हैं… हर चीज को एक टच में ठीक कर देने की ज़िद पीढ़ियों से धैर्य समाप्त कर रही है… इसलिए हर चौथे दिन प्लेयर पे कोई नया गाना बजता है…

कंखौरे-पदौरे टाइप के सिंगर जो काँख-काँख के मुंह से शुरू होकर मुहाने तक का जोर लगा देते हैं सुरों को तराशने में और आप चार दिन व्हाट आ कंपोज़ बोल के अपने बड़े बड़े जेबीएल के साथ कमरे का चौराहा बना देते हैं और चौथे ही दिन वो कंपोज़ किस कम्पोस्ट में जा मिलता है आपको खुदको पता नहीं होता… इसे अगर आप “क्लास और संगीत” का नाम देते हैं तो गलती आपकी नहीं है… आप बस एक दौर विशेष के शिकार हैं जहाँ संबंध और संगीत बस दिखावे के लिए रचे जाने वाला क्षणिक स्वांग है…

हाँ आपका ये स्वांग कत्तई आपको हक नहीं देता कि किसी विक्रम, गणेश या छोटा हाथी में बीज रहे नब्बे के दशक के हरदिल अजीज संगीत की हँसी न उड़ाएं… चाहे वह कितना ही जख्मी दिख टाइप का क्यों न हो… क्योंकि कोई मनोहरा है जो उसे बीस साल से अपने सीने से लगाये घूम रहा है… और मनोहरा आज भी रिश्ते निभाने में हम में से कइयों से ज्यादा बेहतर है…

संगीत की पसंद/नापसंद भी आस्था और अभिव्यक्ति की आजादी जैसी ही है… धन्यवाद

साभारः लंठई