विद्या मनुष्य का श्रेष्ठ गुप्त धन है

विद्या नाम नरस्य रूपमधिकं प्रच्छन्नगुप्तं धनं,
विद्या भोगकरी यश: सुखकरी विद्या गुरुणां गुरु:।
विद्या बन्धुजनो विदेशगमने विद्या परा देवता,
विद्या राजसु पूज्यते नहि धनं विद्याविहीन: पशु:।।

भावार्थः भर्तृहरि रचित नीतिशतक के इस श्लोक में कवि विद्या के महत्व की बहुत सुन्दर बात कहते हैं। आज की तारीख में भी भर्तृहरि की यह उक्ति प्रासंगिक है। वह कहते हैं कि विद्या ही मनुष्य का श्रेष्ठ गुप्त धन है। विद्या ही भोग,यश एवं सुख की दात्री है। यह गुरु की भी गुरु है। विदेश में एक मात्र विद्या ही बन्धु का स्वरूप है। विद्या ही परम देवता है, यही सर्वत्र पूजी जाती है। अत: विद्या हीन पुरुष पशु के समान ही हैं।