हाहाकारी पत्रकारिता


#1

सोशल मीडिया पर वाजिब आरोप लगता है कि यहाँ कोई संपादकीय नियंत्रण नहीं होता जिसके चलते कोई भी, कुछ भी लिख सकता है। तथ्यों की जांच एवं भावनाओं को नियंत्रित रखते हुए विशुद्ध समाचार एवं विचारों का आदान-प्रदान नहीं होता इस नाते यह माध्यम संदिग्ध है। चलिये अच्छी बात है किंतु देश के टीवी चैनल भी इस समय हाहाकारी पत्रकारिता पर उतर आये हैं जबकि इनके पास ‘कई लेयर’ का संपादकीय नियंत्रण होता हैं और होती है एक गाइडलाइन लेकिन अब सब बेकार हो चुका है। अब ये चैनल टीआरपी की हवस में खुद हैवानियत की हद तक गिर चुके हैं।

पिछले कुछ समय से शायद ही कोई हफ्ता, दो हफ्ते ऐसा बीता हो जब कर्त्तव्य पालन करते हुए कश्मीर में कोई जवान वीरगति को प्राप्त न हुआ हो। इस बीच जब आतंकी हमले में भारी संख्या में जवानों की आहुति हुई तो इन चैनलों में भी उबाल आ चुका है, हालाँकि मेकअप और शूट टाई का पूरा ध्यान रखा गया है लेकिन दर्शकों की भावनाओं से खेलने का काम पूरे जोरशोर से शुरू है। घाटी में अधिकांश स्थानों पर तापमान शून्य और उसके आसपास है, उत्तर भारत में भी अभी कड़ाके की ठंढ है और इसी ठंढ में, अभी के अभी इन चैनलों को भी युद्ध चाहिये। इस मसले पर ये सड़कों पर रायशुमारी कर रहे हैं, गरम कपड़ों में लिपटे लोग मुट्ठियाँ भींच कर पडोसी देश पर तुरंत हमले की बात कर रहे हैं। दूध से लेकर खून तक में मिलावट करने वालों का राष्ट्रप्रेम जाग चुका है। भ्रष्टाचार के महल खड़े करने वाले देश के लिए दहाड़ रहे हैं, जीवन में शुचिता और नैतिकता को ताक पर रख कर आगे बढ़ने की होड़ में लगे हुए लोग भी ललकार रहे हैं।

इनसे मुझे कोई आपत्ति भी नहीं है लेकिन जिन्हें वास्तविक युद्ध लड़ना है वो लोग हमसे आपसे अधिक क्षुब्ध होंगे और रणनीतियाँ बना रहे होंगे ही किंतु उन्हें पता है कि रिमोट से चैनल बदल देने से कहीं बहुत लंबी रणनीति की जरूरत है। इसी कारण डायरेक्टर जनरल मिलिट्री ऑपरेशंस या सेना प्रमुख अभी शांत हैं, आतंकग्रस्त इलाके के सैन्य कमांडर भी मीडिया से दूर हैं, सामने हैं तो केवल वो लोग जिन्हें ललकार लगा कर फिर रजाई में घुस जाना है। इन्ही लोगों के लिए मीडिया है, इन्हीं से उसकी टीआरपी है। ऊपर जो चित्र है उसमें वीरगति को प्राप्त एक सैनिक की पत्नी के मुँह में माइक घुसेड़ दिया गया है, दर्शकों को बताया जा रहा है कि वीरनारी नौ महीने की गर्भवती हैं और इनको कभी भी प्रसवपीड़ा शुरू हो सकती है। यह टीवी पत्रकारिता का हाहाकारी रूप है, वीरनारी की संतान स्वस्थ हो, अपनी माँ का सहारा बने क्योंकि ये चैनल वाले उनके काम नहीं आने वाले लेकिन ऐसी पत्रकारिता का स्विचऑफ होना जरूरी है। भावनाओं को भड़का कर अपने मुनाफे के लिए किये जा रहे काम को जनहित में जारी समाचार कहा जाना बंद होना चाहिये, क्योंकि जिनके घर के गए उन्हें सामान्य होने में लंबा समय लगेगा पर बाकियों की दिनचर्या पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। लानत है ऐसी पत्रकारिता पर।


#2

Excellent post. Thanks for this. ये कालनेमी रूप है पत्रकारिता का.


#3

इन्होंने पत्रिकारिता को इतना कलंकित कर दिया है कि अब कोई ठीकठाक आदमी इस पेशे में आने की हिम्मत भी नहीं करता है। सोशल मीडिया के प्रादुर्भाव से इतना तो जरूर हुआ है कि जिन लोगों को ये ‘लेटर टू द एडिटर कॉलम’ में जगह नहीं देते थे, या सिंगल कॉलम में निपटा देते थे, वही उनसे न केवल उनके ही वॉल पर जाकर सवाल पूछते हैं, बल्कि बड़ी बहस चला रहे हैं। यही वजह है कि मीडिया के मठाधीसों की फटी पड़ी है। रवीश से लेकर राजदीप तक, सभी ‘ऑबसोलेट’ होने वाले हैं।


#4

‘obselete’ होने में बहुत समय है क्यूंकि विकास की वजह से असुरता छूट जाये ऐसा नहीं होता। बहुत मायावी होती है असुर प्रवृति। टीवी obselete भी हुआ तो ये अपना माइक youtube पर घुमा देंगे


#5

दोयम दर्जे के रिपोर्टरों के हाथ में माइक, बंदरों के हाथ में उस्तरा जैसा दिखता है।


#6

जो भी सूचनाओं एवं विचारों/समाचारों का आदान प्रदान किसी भी माध्यम से करता है,वह पत्रकार ही है लेकिन आज सारे मानदंड टूट चुके हैं। किसी का नाम लिए बगैर कहिये की पत्रकारिता की फटी में सब टाँग अड़ा रहे हैं।जहाँ तक टीवी की बात है तो जो लोग नेट कायदे से एक्सेस करते हैं उनके यहाँ टीवी न्यूज़ लगभग बन्द ही है।बाकी सबके खेमे हैं और अपनी पसंद के पत्रकार लेकिन आम दर्शक एक भावुक उपभोक्ता है जिसका शोषण ही हो रहा है।


#7

Why only journalism or journalists when none is spared from debouchery. What could be the fundamental reason to this? Maybe this state of existence is inevitable, as time progresses this will just evolve and put on a garb or a disguise but essentially will still be remorseless!


#8

सही है, सूचनाओं का आदान-प्रदान करने वाला व्यक्ति पत्रकार होता है। स्मार्टफोन के जमाने में आज प्रत्येक व्यक्ति पत्रकार है। मैनें, खास उन पत्रकारों की बात की थी, जो वक्त-वेवक्त, जहां-तहां माइकबाजी करने लगते हैं।


#9

पत्रकारिता कर कौन रहे हैं, सब पापी पेट के जोगार में हैं. सारे के सारे अब लोगों की नजरों में गिर चुके हैं. सोशल मीडिया फिर भी हमें ज्यादा ईमानदार लगता है!