कश्मीर का इलाज क्या है?

पाकिस्तान के प्रति भारतीय दृष्टि तथ्यात्मक रूप से सदा दोषपूर्ण रही है।

पाकिस्तान ने आज़ादी की हलचल शुरू होते ही कश्मीर पर क़बाइलियों की आड़ में सैन्य आक्रमण किया और तत्कालीन भारतीय नेतृत्व की कमजोरी के कारण उसके एक बड़े हिस्से पर कब्ज़ा कर लिया, जिसे वह आज ‘आज़ाद कश्मीर’ कहता है। बाद में भी भारतीय नेताओं ने बड़ी-बड़ी मूर्खताएं कीं, जिनके कारण आक्रमणकारी पाकिस्तान इस्लाम का रहनुमा बन कर ‘अपने हममज़हब कश्मीरी भाइयों’ के हितों के रक्षक का नक़ाब लगा लेने में सफल हो गया और भारतीय नेताओं की बेवकूफ़ी से एक सीधा-सादा अतिक्रमण का द्विपक्षीय मसला यूएन तक जा पहुंचा।

एक वक्तव्य याद करें। पूरब की बेटी बेनज़ीर भुट्टो के अब्बा हुजूर जुल्फ़िक़ार अली भुट्टो को पाकिस्तान में फांसी पर लटकाया गया था। इससे पहले जब वे उस मुल्क के पीएम थे, तब उन्होंने कहा था - ‘हमें भले ही एक हज़ार साल तक लड़ना पड़े। भूखों मरना पड़े। घास-फूस की रोटी खाकर गुज़ारा करना पड़े। सब कुछ सहन करेंगे, लेकिन कश्मीर लेकर रहेंगे।’

यह कोई सामान्य कथन नहीं था। यह पाकिस्तान की राजनीति का आदि और अंत बयान करने वाला कथन है। शुरुआत से लेकर आज तक पाकिस्तान के रहनुमां इसी के इर्द-गिर्द घूमते, चुनाव जीतते और सत्ता-सुख भोगते रहे हैं।

इस तरह, अगर कोई कूढ़मग़ज़ बुद्धिजीवी यह स्थापित करता है कि पाकिस्तान की जनता तो बहुत मैत्रीपूर्ण है, यह सब किया-धरा वहां की ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई, मिलिट्री और शासकों का है, तो यह कोरी ख़ामख़याली से आगे बढ़ कर शातिराना साज़िश है। अगर इन शातिरों की स्थापना सही है, तो भला ऐसे नेता पीढ़ी-दर-पीढ़ी वहां जीतते और शासन करते कैसे आए हैं?

अर्थात पाकिस्तान का एकमात्र एजेंडा है, भारत से कश्मीर हथियाना और इसके लिए वह कोई भी क़ीमत चुकाने को तैयार है।

इसके बरअक्स भारतीय पक्ष ने हमेशा मूर्खताओं के अम्बार खड़े किए हैं। कई युद्धों में पाकिस्तान को हराया, लेकिन हमेशा उसे ऐसे ही छोड़ दिया। विजेता को उससे कुछ तो वसूल करना था? नहीं किया। 1971 के युद्ध में बांग्लादेश को आज़ाद कराया गया। लगभग 94 हज़ार पाकिस्तानी सैनिक बंदी बनाए गए, लेकिन छोटे भाई समझ कर छोड़ दिए गए। 2 जुलाई 1972 को शिमला समझौता रूपी एक दोना भी हासिल हुआ, जिसका कबाड़ पाकिस्तान न जाने कितनी बार चीन को बेचता रहा और हमारे हुक्मरान नींद लेते रहे।

यह पूछा जाना चाहिए कि एक दुश्मन देश को बार-बार हराने के बावजूद उस पर इतनी मेहरबानियों का कारण क्या है? पूछा जाना चाहिए कि अगर आपने इतनी मूर्खताएं नहीं की होतीं, तो क्या यह संभव था कि पाकिस्तान आज अपने स्कूली बच्चों को पढ़ाता है - ‘पाकिस्तान ने तमाम युद्धों में भारत को हराया है। भारत युद्धों के बारे में ग़लत दावे करता है।’

अगर आपने ऎसी मूर्खताएं नहीं की होतीं और उससे पर्याप्त हर्जाना वसूला होता, तो क्या वह यह सीनाजोरी करने के क़ाबिल होता?

कांग्रेस की शुरुआती आदत है - समस्या पैदा करो। उसे हल करने का नाटक करते हुए बना रहने दो और उसकी दुहाई देते हुए वोट बटोरते रहो।

जवाहरलाल नेहरू के शासनकाल में कश्मीर समस्या बन कर उभरा और उनके उत्तराधिकारियों ने उसे इस कदर नासूर बना दिया कि आज समूचा भारत त्राहि-त्राहि कर रहा है। इतना ही होता तो और बात थी, इसकी आड़ में कई विदेशी शक्तियां मध्यस्थता का बाना पहन कर घुसपैंठ की तैयारी में हैं।

इंदिरा गांधी ने पंजाब में आतंकवाद का बीज बोया। सत्ता पर काबिज़ होने की हसरत पाले अपने पुतले भिंडरावाले को खड़ा किया, जो उस राज्य और उसके बाहर भी हज़ारों लोगों के कत्ले-आम का कारण बना। जब भस्मासुर दुख देने लगा, तो प्रियदर्शिनी ‘ऑपरेशन ब्लूस्टार’ के लिए विवश हुई, जिसके कारण कुछ समय बाद अपनी जान गंवानी पड़ी, तो ‘देश के लिए शहीद’ घोषित हो गईं। अगर इंदिरा गांधी देश के लिए शहीद हुई हैं, तो उनके द्वारा पनपाए गए आतंकवाद की बलि चढ़े हज़ारों लोग क्या हैं?

राजीव गांधी ने लिट्टे उग्रवादियों को पनपाया-प्रश्रय दिया, अंततः उन्हीं का शिकार हुए, तो ‘देश के लिए शहीद’ हो गए। यह देश के लिए शहादत है, तो भगत सिंह आदि क्रांतिकारी क्या थे? वे तो आज तक आपके दस्तावेज में आतंकवादी हैं।

सोनिया जी और राहुल जी की कांग्रेस को देख लें। आतंकवादियों का कोई धर्म नहीं होता है, लेकिन भगवा आतंकवाद होता है और वह सबसे ज्यादा खतरनाक है। देश में सबसे खतरनाक कौन हैं, यह उनके प्यादे बार-बार घोषित करते रहते हैं। उसने ऐसा क़ानून बनाने की कोशिश की, जिसके अस्तित्व में आ जाने के बाद बहुसंख्यक समुदाय का जीना दुश्वार हो जाता।

अगर मोदी सरकार नहीं आई होती, तो क्या देश को पता लग पाता कि कांग्रेस कश्मीर के अलगाववादियों को शुरुआत से बड़ी-बड़ी रकमों का प्रतिमाह भुगतान विशेष भत्तों के रूप में करती आई है। वे बिना कोई काम किए आलीशान ज़िंदगी जी रहे हैं। जिन सैन्यबलों पर इनके पाले आतंकी हमला करते हैं, उन्हें मारते हैं, वे ही इनकी सुरक्षा में तैनात रहते हैं। उनके बच्चे विदेशों में पढ़-लिख कर वहीं के नागरिक बन रहे हैं, ताकि अपना जीवन आनंदपूर्वक गुज़ार सकें। और इन्हीं दोगलों ने कश्मीरी अवाम का जीना मुहाल कर रखा है। ये न स्कूल खुलने देते हैं, न सिनेमाघर। आतंकवाद को इन्होंने व्यापार बना लिया है और उसके सहारे धन का अम्बार खड़ा कर रहे हैं।

भारतीय कश्मीरी नेताओं और उनके चमचे बुद्धिजीवियों के वक्तव्य ध्यान से सुनें। इनकी गतिविधियां गौर से देखें। भारतीय सेना बलात्कारी है। वह जोर-जबरदस्ती करती है। पत्थरबाज भटके हुए नौजवान हैं। उन्हें नौकरी नहीं मिलती, तो मज़बूरी में यह सब करते हैं। जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्ज़ा प्राप्त है, अतः वहां भारत के किसी अन्य राज्य का कोई व्यक्ति न तो संपत्ति खरीद सकता है, न रह सकता है, लेकिन एक दूसरे देश म्यांमार से आए रोहिंग्या वहां ठसक से बस सकते हैं और उन्हें देश से निकाला नहीं जा सकता, क्योंकि वे मुसलमान हैं और उनकी पैरवी करने वाले दीमक के अवतार यहां बहुतेरे हैं।

मेरे जो मित्र बात-बात पर युद्ध-युद्ध का उद्घोष करने लगते हैं, मुझे उन पर हंसी आती है। इसलिए नहीं कि यह कोई अनुचित हरकत है। निश्चय ही उरी और पुलवामा जैसे जघन्य अपराधों के समय खून खौलना चाहिए। जिसका खून नहीं खौलता, वह निश्चय ही या तो देशद्रोही है या विक्षिप्त है। किंतु सीधे एक मांग - युद्ध - कतई उचित नहीं है। इसके कई आस्पेक्ट हैं, कई परिप्रेक्ष्य हैं। वह सब हमें ध्यान रखना ही चाहिए।

युद्ध किसी भी देश की अर्थव्यवस्था को कम अज़ कम एक दशक पीछे धकेल देता है। नई पीढ़ी का पता नहीं, लेकिन मुझे बहुत छोटा होने के बावजूद बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के बाद के भारत की स्थितियां आज तक याद हैं। मैं 1962 में जन्मा यानी 1971 में मैं सिर्फ नौ साल का था, लेकिन मुझे याद है कि उसके बाद बरसों तक जब भी हम कोई सामान खरीदने जाते थे, तब खुले पैसों के एवज़ में बांग्लादेश की सहायतार्थ कुछ रसीदी टिकट जैसे पर्चे थमा दिए जाते थे। मुझे नहीं पता कि ऐसा कोई सरकारी आदेश था या नहीं, लेकिन दुकानदार अधिक से अधिक उगाही के लिए विवश था। खुले पैसे वह कतई नहीं लौटाता था। मान लीजिए, आपने दो रुपए चालीस पैसे का सामान खरीदा और तीन रुपए दिए, तो साठ पैसे के टिकट आपके हाथों में होते थे और ढाई रुपया देने की स्थिति में दस पैसे के। यह स्थिति भारतीय उपभोक्ता ने लगभग दो-ढाई दशक तक भुगती थी।

दो-तीन मुद्दे हमेशा याद रखें - भारत ने अपने सम्पूर्ण इतिहास में कभी किसी पर आक्रमण नहीं किया। सदा आक्रमणकारियों को उचित उत्तर दिया है। हमारा ध्येय और परम लक्ष्य शान्ति है, लेकिन हमने हमेशा सिद्ध किया है कि यह हमारी शर्तों पर होनी चाहिए। आप आक्रमण करेंगे, तो उसे भी सहन कर लेना ‘वसुधैव कुटुंबकम’ के दायरे में नहीं आता। और यही सबसे बड़ा कारण है कि आज भारत को वैश्विक पटल पर एक विशिष्ट आदर दिया जाता है।

यह भी याद रखें कि पाकिस्तान कश्मीर समस्या में सिर्फ एक अंग है। इस समस्या की शुरुआत उसने अवश्य की, लेकिन अब इसके कई छुपे हुए पक्ष हैं। कई स्टेकहोल्डर हैं। बलोचिस्तान में चीन के अनेक प्रोजेक्ट चल रहे हैं। वहां वह भीषण स्थानीय विरोध के बावजूद अपने नागरिकों की कॉलोनी बसाने को कटिबद्ध है। खून की अनेकानेक होली वहां खेली गई हैं। हज़ारों बलोच युवक-युवतियां गायब कर दिए गए हैं। पाकिस्तानी आर्मी जब जिसे चाहे, उठा कर ले जाती है और फिर उसका कोई पता नहीं लगता।

ठीक यही हालात उस ग़ुलाम कश्मीर के हैं, जिसे पाकिस्तान ‘आज़ाद कश्मीर’ कहता है। पाक अधिकृत कश्मीर (पीओके) में भी चीन की कई परियोजनाएं लंबित हैं। सिंधु नदी पर एक बांध बनाने की परियोजना 14 अरब डालर की है। यह भारत की वर्तमान सरकार का प्रबल विरोध ही है कि पाकिस्तान को इस परियोजना के लिए विश्व बैंक जैसे वित्तीय संस्थानों से धन जुटाने में दिक्कत आ रही है। यह लंबित है, लेकिन रद्द नहीं। स्थितियां अनुकूल होते ही पाक कभी भी इसे चीन को स्थानांतरित कर सकता है।

भारत ने पीओके से गुजरने वाली सीपीईसी परियोजना पर भी गहरी आपत्ति दर्ज़ कराई है, लेकिन चीन उसे पूरा करने को उद्धत है। यह सब साफ़ करता है कि ग़ुलाम कश्मीर में चीन के गहरे स्वार्थ मौजूद हैं। ऎसी स्थिति में उससे मसूद अज़हर के खिलाफ कोई एक्शन लेने की उम्मीद ही व्यर्थ है। यहां यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि चीन को भली-भांति पता है कि आतंकवादियों के मुंह खून लगा हुआ है। जब तक वे भारत में गज़वा-ए-हिन्द में व्यस्त हैं, उसके मज़े हैं; जैसे ही यह ध्येय आतंकियों के सामने से हटता है, इन्हीं आतंकियों को याद आ जाएगा कि चीन में लगातार दमित-उत्पीड़ित किए जा रहे उइगुर भी उनकी उम्मा का ही हिस्सा हैं और उनका रुख उस तरफ भी हो सकता है।

यह भी याद रखें कि निहित स्वार्थ सिर्फ चीन के ही नहीं हैं। मध्यस्थ बन कर रोटी का फैसला करने को ऎसी अनेक लोमड़ियां तैयार बैठी हैं, जिन्हें पूरी रोटी अपनी नज़र आती है। तिब्बत को याद करें। चीन ने उसे बड़ी आसानी से हड़प लिया और कोई वैश्विक शक्ति वहां नहीं आई। इसलिए कि वहां उस वक्त उनके कोई हित नहीं सधते थे। अफ़ग़ानिस्तान, इराक़, सीरिया आदि में बात-बात पर अपनी सेना तैनात कर देने वाली महाशक्तियों ने तिब्बत की ओर रुख क्यों नहीं किया?

साफ़ है कि वहां से उन्हें कुछ हासिल होने वाला नहीं था। इसके उलट कश्मीर की स्थिति कई उन देशों के लिए फायदेमंद है, जो भारत को मज़बूत राष्ट्र के रूप में खड़ा होता देखना नहीं चाहते। उनके षड्यंत्र यहां दबे-छुपे चलते रहते हैं। इनमें कई खाड़ी देश प्रमुख हैं। वे भारत के इस्लामीकरण के लिए अनेक माध्यमों से बड़ी मात्रा में धन भेजते हैं, जो लगातार विभिन्न प्रकार के जिहादी कामों और धर्मांतरण में खर्च किया जाता है। बीच-बीच में धनागम के ऐसे माध्यम कई बार पकड़े गए हैं।

लेकिन इन सबसे परे है हमारी अंदरूनी यानी घर की समस्या। कश्मीर पर विचार करते समय यह स्पष्ट समझ लेना चाहिए कि कश्मीरी पंडितों को सुनियोजित तरीके से वहां से बेदखल करना कोई सामान्य घटना नहीं थी। यह इस्लामी उम्मा का जिहाद है। वह ग़ज़वा-ए-हिन्द के लिए उस पर आमादा है और उस पर लगातार काम कर रही है। जो भी इस हक़ीक़त को नकारता है, वह या तो निहायत मूर्ख है या इन ताक़तों का शातिर दलाल है, जो स्वयं इस खेल में शामिल है।

लगभग तीन दशक से भारत में बसीं जर्मन इंडोलॉजिस्ट मारिया विर्थ ने अपने एक आलेख में सीधा सवाल पूछा था -

1947 में भारत के धार्मिक आधार पर दो टुकड़े हुए। एक हिस्सा ‘पाकिस्तान’ मुसलमानों ने हासिल किया। यह कहते हुए कि जिस देश में हिंदू बहुसंख्यक हैं, वहां हम रह नहीं सकते। वहां हमारे अधिकारों की रक्षा नहीं हो सकेगी। दूसरा ‘हिंदुस्तान’ हिंदुओं को मिला। यह आज तक एक है, लेकिन मुस्लिम हिस्सा दो टुकड़ों - पाकिस्तान-बांग्लादेश में टूट गया। अब रोहिंग्या म्यांमार से बेदखल किए जा रहे हैं, तो वे दो मुस्लिम हिस्सों के बजाय एक हिंदू बहुल भारत में बसना चाहते हैं। क्यों? क्या हिंदू राष्ट्र में अधिक सुरक्षा इसका मूल कारण है या शेष स्वप्न ‘ग़ज़वा-ए-हिंद’ की तरफ एक सोचा-समझा बड़ा क़दम है?

मारिया विर्थ का यह कथन सीधे नब्ज पर हाथ रखता है। ज़रा सोचें, रोहिंग्या अपने सबसे नज़दीक इस्लामिक देश पाकिस्तान और बांग्लादेश क्यों नहीं गए? भारत और वह भी हिंदूबहुल जम्मू रीजन उन्होंने क्यों चुना? भारत आना ही था, तो कश्मीर घाटी क्यों नहीं? हिंदूबहुल जम्मू ही क्यों? सारे देशविरोधी बुद्धिजीवी उन्हें यहीं रखने पर आमादा क्यों हो गए?

ध्यान रखें, जब तक आप स्वीकार नहीं करते कि आतंकवाद का एक मज़हब है और वह ‘पाक कुरआन’ के एक सिद्धांत ‘जिहाद’ से उत्प्रेरित है, तब तक कश्मीरी आतंकवाद का कोई इलाज़ संभव नहीं है।

कश्मीर के इतिहास पर नज़र करें। कहा जाता है कि कश्मीरी पंडित मुसलमानों से अधिक समृद्ध थे। उन्होंने उन्हें उनका हक़ नहीं दिया, इसलिए वे विवश हुए कि विद्रोह करें। कश्मीरी पंडितों को बेदखल कर संसाधनों पर कब्ज़ा जमा लें। ऐसे मूर्खतापूर्ण तर्क उस सेक्यूलर जमात से आते हैं, जिसके अगुआ अशोक कुमार पांडेय जैसे सावन के अंधे टिप्पणीकार हैं।

कश्मीर घाटी में बड़े पैमाने पर अभियान चलाया गया कि समस्त हिंदू प्रतीकों को मिटा दिया जाए। सैकड़ों मंदिर तोड़ दिए गए। यहां तक कि श्रीनगर में डल झील के नजदीक स्थित हिंदुओं के सर्वोच्च धर्मगुरु शंकराचार्य को समर्पित पहाड़ी का नाम बदल कर ‘तख्त-ए-सुलेमान’ कर दिया गया। अनेक प्रतिष्ठित भारतीय, अमेरिकी और यूरोपीय विद्वानों ने भी अपनी पुस्तकों में इस पहाडी को शंकराचार्य पहाड़ी ही उल्लेखित किया है। लेकिन वह सब एक तरफ पड़ा रह गया और नाम बदल दिया गया। और यह मूर्खतापूर्ण काम किसी आतंकवादी संगठन ने नहीं, भारत के पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने किया था।

एएसआई ने पर्यटक सूचना पट्टिका पर शंकराचार्य हिल के इतिहास की एक बेतुकी और भ्रामक प्रस्तुति की। इसमें बताया गया कि इस पहाडी पर कभी यहूदियों का कब्जा था, इसलिए इसका नाम ‘तख्त ए सुलेमान’ या ‘सुलेमान का सिंहासन’ किया गया है। वस्तुस्थिति यह है कि शंकराचार्य पहाड़ी पर स्थित संरचना का निर्माण भारत में इस्लाम के आने से भी सदियों पहले का है। शंकराचार्य ने सम्पूर्ण देश की यात्रा कर देश के चार कोनों पर शारदा पीठ की स्थापना की थी। उसी समय से अर्थात विगत तेरह सौ वर्षों से इस पहाडी को ‘शंकराचार्य पहाड़ी’ कहा जाता रहा है, किन्तु इसका कोई उल्लेख तक इस पट्टिका में नहीं किया गया। इसके बजाय इसे मुगल संरचना बता कर जीर्णोद्धार की बात कही गई।

यह स्थिति सिर्फ इसी हिंदू प्रतीक या संरचना की नहीं है, ऐसे अनेक उदाहरण कश्मीर घाटी में मौजूद हैं। इसी के साथ ख़रीदे गए ग़ुलाम पिछले अनेक वर्षों से यह स्थापित करने में जुटे हैं कि कश्मीर से पंडितों का पलायन जेनोसाइड नहीं था, वे तो खुद वहां से भागे थे और अब लौटना ही नहीं चाहते। ऎसी स्थापनाएं करने वाले काम कहां करते हैं यानी उनकी रोजी-रोटी कहां से चल रही है, इस पर ध्यान दें, तत्काल समझ आ जाएगा कि ये दोगले नाममात्र के लिए हिंदू हैं। ये सच कभी बोल ही नहीं सकते। दरअसल कश्मीर में इस्लामी धनबल से जिहाद चल रहा है, जिसे खुले हृदय से स्वीकारना होगा। इसके अलावा कोई चारा नहीं।

यह स्थिति क्यों है कि देश में हिंदू नामधारी ‘हिंदू विरोधियों’ की संख्या बहुत बड़ी है। ये हर संभव वह करने को तत्पर रहते हैं, जिससे हिंदू समाज और संस्कृति के मुख पर कालिख पुते और उसकी तुलना में अन्य धर्म अधिक प्रगतिशील दिखाई दें। बुरका और घूंघट जैसे बहुत सारे उदाहरण हैं, लेकिन अभी हमें उनमें नहीं उलझना चाहिए। सिर्फ एक उदाहरण देखें - भारत अपने नागरिक कुलभूषण जाधव की रिहाई के लिए पाकिस्तान से अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में मुकदमे में फंसा है। जीतोड़ कोशिश की जा रही है कि उनका हस्र सरबजीत जैसा नहीं हो। उन्हें सही-सलामत वापस भारत लाया जाए, लेकिन भारत के तीन तथाकथित जर्नलिस्ट देश आदि को ताक पर रख कर ऎसी स्टोरी अपने माध्यमों में शाया करते हैं, जिनसे जाधव भारत का जासूस साबित हो। ये हैं करण थापर, प्रवीण स्वामी और चंदन नंदी। कोई ताज़्ज़ुब नहीं होना चाहिए कि पाकिस्तान के वकील कुरैशी ने अपना पक्ष मज़बूत करने के लिए इन्हीं तीनों के आलेखों का इस्तेमाल किया। इनमें से एक तो अपने संस्थान द्वारा स्टोरी डिलीट कर देने पर रावण बन जाता है, और ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ का राग अलापते हुए गाली-गलौज करता है। यह एक दलाल द्वारा ओढ़ी गई बेशर्मी की हद है।

यह क्यों नहीं माना जाना चाहिए कि इन तीनों ने अपने पाकिस्तानी आका के इशारे और उससे कुछ लाभ मिलने पर ही ऐसे आलेख लिखे। ज़रा सोचें, यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है? यह पत्रकारिता है? जनाब, यह निहायत गिरी हुई हरकत है। यह देशद्रोही कृत्य है। मेरा मानना है कि इसके लिए इन सभी की कड़ी जांच होनी चाहिए। इनकी नागरिकता छीन ली जानी चाहिए और जूते मार कर देश के बाहर धकेल दिया जाना चाहिए।

यह भी ध्यान रखें कि आप जब-जब किसी भी आतंकी घटना के लिए सिर्फ पाकिस्तान को दोषी ठहराते हैं, तब-तब कश्मीरी मुस्लिम और देशभर में फैले उनके स्लीपर सेल मासूम और निर्दोष साबित होते हैं, जबकि ऐसा है नहीं। कहा जाता है कि नौकरी नहीं मिलती, तो नौजवान भटक जाते हैं। फिर आईएएस और आईपीएस बनने के बाद जो हथियार सहित भटक जाते हैं, वे क्या हैं? देश के विभिन्न हिस्सों में सरकारी सहायता से पढ़ रहे विद्यार्थी ऎसी किसी घटना पर जश्न मनाते कैसे दिखते हैं? सीआरपीएफ के इतने सारे जवानों को शहीद कर देने वाला कौन था? क्या हमले में इस्तेमाल वाहन पाकिस्तान से आया था? क्या उसमें प्रयुक्त इतना सारा आरडीएक्स पाकिस्तान से आना संभव है? क्या उसके लगातार पीछा करने के बावजूद किसी को नज़र न आना संभव है? ज़ाहिर है, एक बड़े पैमाने पर स्थानीय सहयोग के बिना यह कुकर्म नितांत असंभव है।

तो इलाज़ क्या है? इलाज़ कश्मीरी पंडितों के जेनोसाइड में छिपा है। जिस तरह वहां से कश्मीरी पंडित भगाए गए थे, ठीक उसी तरह मुस्लिम जनसंख्या का विस्थापन और हिंदू आबादी को बहुसंख्यक करना। सबसे पहले वहां से अलगाववादी नेताओं को उठा कर अलग-अलग प्रांतों में भेजा जाना चाहिए। उसके बाद मुस्लिम नागरिकों को वहां से उठा कर देश के विभिन्न हिस्सों में ले जाकर विशेष बस्तियों में बसाना चाहिए और साथ ही साथ कश्मीर घाटी में सुरक्षित कॉलोनियां स्थापित कर वहां हिन्दुओं को बसाया जाना चाहिए। अब्दुला और मुफ्ती जैसे दोगले नेता परिवार अगर चूं-चपड़ करें, तो यही हस्र इनका भी होना चाहिए। आपको यह दिवास्वप्न लग सकता है, लेकिन ज़रा सोचें, जब आप किसी बांध के लिए एक पूरा गांव या कस्बा विस्थापित कर सकते हैं, तो देश का एक हिस्सा बचाने के लिए यह कार्य असंभव कैसे है?

मेरा मानना है कि इसके बिना इलाज़ संभव नहीं है।

पोस्ट के लिए आलोक शर्मा को धन्यवाद।

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