मेरा बूट सबसे मजबूत


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संत कबीर समाज को बहुत कुछ समझाने की कोशिश तमाम उम्र करते रहे,भाग्यशाली थे की कबीर दास उस युग में हुए जब व्हाट्सएप्प या फेसबुक नहीं था और बुद्धि से पैदल लोगों की जमात भी कम ही रही होगी।उनका आगमन उस युग में था जब असहमतियों का भी पर्याप्त सम्मान था वर्ना आज के युग में वैसी लाइन लेंथ पर चलने वालों के लिए गुंजाइश ही नहीं है।उस युग में लोग निश्चित ही उदार रहे होंगे।जो उदार नहीं रहे होंगे तो भी उनके भीतर उदासीनता का भाव रहा होगा वर्ना जितना कटुसत्य कबीर दास कहते गए उसकी शुरुआत में ही मॉब लिंचिंग हो गई रहती और मोहल्ले के अलावा किसी को पता ही नहीं चलता।खैर यहाँ महात्मा कबीर की व्याख्या करने की इच्छा नहीं है क्योंकि वो तो इन सब से ऊपर की आत्मा हैं।
महात्मा कबीर दास के नाम पर स्थापित जिले संत कबीर नगर से एक समाचार आया है जो वर्तमान लोकतांत्रिक युग की वास्तविकता को सबके सामने रखता है।यहाँ जिला नियोजन समिति की बैठक चल रही थी,यह बैठक नियमित रूप से जनप्रतिनिधियों एवं अधिकारियों की होती है जिसमें जनता के हित हेतु योजनायें बनती हैं।जिन्हें चुना गया है उनकी और सरकार की तरफ से दिखाया जाता है कि किस हद तक मानवीय होने का गुण तंत्र में होता है,यानि हुक्मरान जनता जनार्दन के लिए क्या क्या करते हैं।चर्चा में आयी बैठक में भाजपा सांसद शरद त्रिपाठी ने अपनी ही पार्टी के विधायक राकेश बघेल पर जूतों की बौछार कर दी।
तात्कालिक कारण था कि एक बाँध के मरम्मत के शिलान्यास पत्थर पर सांसद महोदय का नाम नहीं खुदा था।ध्यान रहे कोई नया निर्माण नहीं था,मरम्मत का काम शुरू होने का भी शिलान्यास?उनका सवाल सम्बन्धित विभाग के अभियंता से था लेकिन उसे विधायक ने बीच में लपक लिया था।सांसद महोदय ऐसा भी नहीं है कि किसी संस्कारहीन दल से कूद कर चाल -चेहरा और चरित्र की बात करने वाले दल में आये हों,उनके पिताजी भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं।सांसद महोदय पिछला लोकसभा चुनाव हारने के बाद इस वाली लोकसभा में मोदी लहर पर संसद पहुँचे हैं।हालाँकि वीडियो में स्पष्ट है कि पहले विधायक ने बोला की ‘जूता निकालूँ’,वैसे इस डॉयलॉग से पहले माननीय सांसद कह चुके थे की वो न जाने कितने विधायक पैदा कर चुके हैं।
वैसे आप ध्यान से देखें तो सांसद काफी फुर्तीले लग रहे हैं यानि फिट इण्डिया वाला मन्त्र इन्होंने काफी मन से सिद्ध किया हुआ है या फिर यह भी हो सकता है कि विधायक अभी संकोच में रहे होंगे तब तक जूते बरसने लगे।दनादन -दनादन इतनी बार हवा में हाथ मारने पर सामान्य व्यक्ति थक जाता है जितने जूते सांसद ने मार दिए,हालाँकि विधायक को जूते उतारने का मौका नहीं मिला और उनके दो चार झापड़ ही सांसद को लगे फिर भी मीडिया और तमाम मोबाइल कैमरों के बीच लोकतंत्र के पहरुओं का यह बर्ताव काफी जिगर वाला है।इस कर्मकाण्ड के बीच दोनों एक दूसरे के माता-बहनों के लिए भी काफी संस्कारी शब्दों का उच्चारण कर रहे थे।जाहिर यह भी पुरुष संस्कार ही हैं।सांसद निधि से होने वाले कार्यों पर जिले के विधायकों के नाम गायब रहते थे तो विधायक जी ने अपने काम से सांसद का नाम गायब करवा दिया। गोया अपना खेत बेच कर जनता के लिए विकास करते हैं ये माननीय,जिनके बीच गलियों और जूतों की बौछार के बीच वर्दीधारी आला अधिकारी भी मौन रहने में ही भलाई समझते हैं क्योंकि कानून बनाने वाले,कानून के रखवालों से ऊपर होते है न भाई।
सुनते हैं कि कभी कभी प्रधानमंत्री जी अपने सांसदों की क्लास लेते हैं,पार्टी तो एक्शन लेगी ही लेकिन पीएम साहब इस सांसद से कैसे पेश आते हैं यह देखने वाली बात होगी।दुनिया को अपने संस्कार दिखा देने वाले ये लोग अपने अपने गट के लिए महानायक तो बन ही चुके हैं जिनकी कुल चाहत शिलान्यास के पत्थरों पर अपना नाम खुदवा कर अमर हो जाने की ही रहती है।हाय रे,‘हम न मरें, मरिहैं संसारा’ कहने वाले संत कबीर दास जी।आपके नाम वाली नगरी से ही वह सच उजागर हो गया जिसे जानते सभी हैं लेकिन खुल कर बोलते नहीं,यही लोकतंत्र की आत्मीयता है।कल्लन हलवाई ने झूठ ही कहा था कि ‘नाम में क्या रखा है’, क्या कल्लन ने नहीं कहा था?चलिये आप ही सही हैं भाई,जूते मत उतारियेगा।