अल्पज्ञानी को स्वयं ईश्वर भी प्रसन्न नहीं कर सकतेः नीतिशतकम्


अज्ञ: सुखमाराध्य: सुखतरमाराध्यते विशेषज्ञ:।
ज्ञानलवदुर्विदग्धं ब्रह्मापि नरं न रञ्जयति।।

भावार्थः

मूर्ख व्यक्ति को शीघ्र ही प्रसन्न किया जा सकता है । विशिष्ट विद्वान को और भी आसानी से प्रसन्न किया जा सकता है । किन्तु थोड़ा सा ज्ञान पाकर इतराने वाले मनुष्य को स्वयं ब्रह्मा भी प्रसन्न नहीं कर सकते ।

यह श्लोक भर्तृहरि द्वारा लिखित नीतिशतकम् से लिया गया है। यह आज भी प्रासंगिक है। श्लोक का आशय यह है कि किसी भी मूर्ख व्यक्ति को जल्द ही प्रसन्न, यानी सहमत किया जा सकता है। वहीं, यदि थोड़ी कोशिश करें तो विद्वानों को भी आप अपने मुताबिक सहमत कर सकते हैं। हालांकि, अल्प-ज्ञानियों के साथ ऐसा नहीं है। जो अल्पज्ञानी होते हैं, उन्हें इस बात का भ्रम होता है कि वह सबकुछ जानते हैं। यही वजह है कि ऐसे व्यक्ति को स्वयं ईश्वर भी प्रसन्न नहीं कर सकते हैं।