'सर्फ एक्सेल' के विज्ञापन में अलगाववाद और विखंडन की भावना निहित है, जनमानस को इसे समझने की जरूरत है

‘सर्फ एक्सेल’ का विज्ञापन आज चर्चा में है पर उस विज्ञापन के बीच एक गंभीर विषय भी है जिसपर मानवीय संवेदना को समझने और गढ़ने वाले लोग चिंतित नहीं होते और इनका चिंतित न होना ही भारत में अलगाववाद, विखंडन और इनके जैसी दूसरी मानसिकताओं का पोषण करती है।

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इस देश में कोई भी नहीं है जो इस बात की चिंता करने वाला हो कि अपने चारों ओर की पचासी प्रतिशत आबादी से खुद को अलग दिखने और अलग समझने की मानसिकता ने इस देश को कैसे-कैसे ज़ख्म दिये हैं। क्या कोई इस बात की चिंता करता है कि सुबह-सवेरे लगभग एक जैसे ड्रेस में स्कूल जाते बच्चों के बीच कुछ ऐसे भी बच्चे होते हैं जो उस ड्रेस से इतर बड़े कुर्ते, छोटे पायजामे और तुर्की टोपी में जब मदरसे की ओर बढ़ते हैं तो क्या होता है? ये कोई सोचता है कि एक ही देश, एक ही प्रदेश, एक ही शहर या गाँव-मुहल्ले के अंदर रहने वाले बच्चों में एक बड़ी टोली होली के रंग और पिचकारी से रंग कर भूत बना होता है और वहीं दूसरे कुछ बच्चे उस होली के दिन और भी झख सफ़ेद कपड़े में निकलता है तो क्या होता है? किसी ने कभी चिंता की है कि भारत की अपनी स्थानिक भाषा-बोली के बीच भी जब कोई बिना जरूरत कुछ बिल्कुल अलग और उल्टी भाषा पढ़ने-लिखने लग जाता है तो क्या होता है? कोई सोचता है कि एक समान नाम वाले लोगों के बीच जब कुछ बच्चे विदेशी नाम से जाने जाते हैं तो क्या होता है और क्या होता है जब समाज के कॉमन त्योहारों और परंपराओं से एक समूह खुद को विलग कर खड़ा हो जाता है?

होता ये है कि पाँच-छह साल की उम्र में ही उन छोटे समूह के अंदर विखंडन और अलगाववाद का बीजारोपण होने लगता है जिसे पनपने के लिए अलग से मजहबी तालीम न भी दी जाये तो भी वो उतना ही असरकारी होता है और छोटी उम्र में ही पड़ा विखंडन का ये बीज एक दिन इतना बड़ा हो जाता है कि पूरा राष्ट्र उसका विषफल महसूस करता है।

सर्फ एक्सेल के विज्ञापन की ही बात कर लीजिये और सोचिये कि एक छोटा बच्चा जो शायद बहुसंख्यक मोहल्ले में ही रहता है पर उसके अंदर अलगाववाद की जड़ कितनी गहरी है कि उसे अपने सफ़ेद कपड़े पर रंग का एक कतरा भी बर्दाश्त नहीं है, उसके अंदर जड़वाद इतना समाया हुआ है जिसके चलते वो जानता है कि हँसी-ख़ुशी का एक त्यौहार भी उसके लिये कुफ़्र ही है जिसके ज़द में आकर उसकी इबादत क़ुबूल नहीं होगी। वो इस छोटी सी उम्र में ही अपने कट्टरपंथ पर कितना डिगा है कि साइकल पर जब वो बच्ची उसे सुरक्षित (बिना रंग का) उसके इबादतगाह तक छोड़ती है तो वो ऐसा महसूस करता है कि उसने कुफ़्र और काफिरों पर अंततः विजय पा ही ली।

पाँच-छह के उम्र से खुद को अलग समझने की मानसिकता धीरे-धीरे विभाजन और अंततः पूरे विखंडन तक पहुंचती है जिसका विष-परिणाम देश कई बार देख चुका है। इसी मानसिकता ने अफगानिस्तान को भारत भूमि से अलग किया, इसी जड़वाद ने 1947 का विभाजन करवाया और दुर्भाग्य से यही मानसिकता आज भी उसी रूप में है जो एक नहीं बल्कि कई-कई विभाजनों का बीज अपने गर्भ में पाल रही है।

सर्फ के इस विज्ञापन के मायने ये भी है। उस विज्ञापन के विरोध मात्र से ही ये समस्या खत्म नहीं होने वाली क्योंकि उस विज्ञापन के बंद होने से भी ये मानसिकता खत्म नहीं होगी और ये चिंता की बड़ी बात है। इसलिये जरूरी है कि अलगाववाद और विखंडन की हर मानसिकता के निस्तारण के उपाय ढूंढें जाये।

और कहने की जरूरत नहीं है कि बीमारी गंभीर है तो उपाय भी उसी के अनुरूप ही हो।

अभिजीत सिंह के फेसबुक पेज से आभार सहित।