अच्छे लोगों की संगति से बुद्धि की जड़ता मिटती है

जाड्यं धियो हरति सिञ्चति वाचि सत्यं,
मानोन्नतिं दिशति पापमपाकरोति।
चेत: प्रसादयति दिक्षु तनोति कीर्तिं,
सत्संगति: कथय किं न करोति पुंसाम्।।

भावार्थः

सज्जनों की संगति (साथ) को सत्संगति कहा जाता है। अच्छे लोगों की संगति से बुद्धि की जड़ता मिटती है। मिठास में बोलचाल पापों से दूर करती है, मन मस्तिष्क को शान्त करती है, यशकीर्ति को सुन्दर दिशाओं में फैलाती है।

सत्संगति का अर्थ है अच्छी संगति। मानव के लिए समाज में उच्च स्थान पाने के लिए सत्संगति उतनी ही ज़रूरी है, जितनी कि जीवित रहने के लिए भोजन। बुरे व्यक्ति का समाज में बिलकुल भी सम्मान नहीं होता और ऐसे व्यक्ति की संगति में रहने से कोई भी अच्छाई की राह से भटक सकता है। अतः हर मानव को कुसंगति से दूर रहना चाहिए।

भर्तृहरि रचित नीतिशतकम् के 23वें श्लोक में राजा भतृहरि ने सत्संगति की बहुत सुन्दर व्याख्या की है। भर्तृहरि कहते हैं कि सज्जनों के संगति से ह्रदय का विचार पवित्र होता है । इससे लोग स्वार्थ भाव त्यागकर जनकल्याणकारी कार्य करता है। दुर्जनों की संगति से दुर्बुद्धि आती है। वहीं, सज्जनों की संगति से दुर्जन भी सज्जन हो जाता है। भारत के इतिहास के लिहाज से अगर देखें तो दुष्ट दुर्योधन के साथ रहने से भीष्म भी गाय के हरण में शामिल होने गए थे। वहीं, ऋषियों की संगति से व्याधा वाल्मीकि भी कवि वाल्मीकि हो गए। अतः सच ही कहा गया है कि सत्संगति से क्या संभव नहीं है।

यही वजह है कि बड़े-बुजुर्ग अक्सर कहते हैं, सत्संगे गुणा-दोषः।

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