मोदी सरकार ने भी इजरायल के खिलाफ वोट दिया है


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संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में मसूद अजहर को आतंकी घोषित करने के प्रस्ताव पर चीन ने वीटो कर दिया।यह प्रस्ताव पुलवामा हमले के अगले ही दिन फ़्रांस,अमेरिका और ब्रिटेन की तरफ से आया था।इस प्रस्ताव पर चीन के अड़ंगे से अपने देश के एक बड़े वर्ग में भी ख़ुशी का माहौल लग रहा है।यह प्रभावी एलीट वर्ग है जिसपर देश के बाहर के लोगों की भी नज़र रहती है।राजनैतिक मतभेदों के चलते देश की राजनीति में मनभेद भी इतना गहरा घर कर गया है कि अब सबकुछ पार्टीबंदी की भेंट चढ़ गया है।कांग्रेस के समर्थक ही नहीं वरन जिम्मेदार नेतागण भी इस मुद्दे पर भारत सरकार की असफलता को प्रधानमंत्री की व्यक्तिगत हार मानकर तंज कसते हुए बेशर्म हुए जा रहे हैं।अगर यह मोदी की व्यक्तिगत हार है तो क्या ‘हिंदी - चीनी भाई - भाई’ नारा देने वाले नेहरू जी के लिए भी वो शर्मिंदा होंगे?यहाँ बात नेहरू जी को कोसने की नहीं है,विदेश नीति के मामलों में आज पूरी दुनिया को पता है कि किसके साथ किस देश के संबंध कैसे हैं।ऐसे में बड़े अवसरों पर उन देशों का क्या रवैया रहेगा यह भी पहले से ही पता चलता है।

चीन के लिये सामरिक और व्यापारिक रूप से पाकिस्तान का जो महत्व है वह किसी से छिपा नहीं है,साथ ही मुसलमानों के नाम पर देश को बांधे हुए पाकिस्तानी तंत्र की भी मजबूरी है कि वह उगियार मुसलमानों पर चीनी दमन पर भी चुप्पी साधे रहे।इस मुद्दे पर नए पाकिस्तान वाले इमरान भी कुछ नहीं बोल सकते,यहाँ तक की सऊदी प्रिंस सलमान भी बीजिंग में बोल चुके हैं कि चीन वही कर रहा है जो उसके राष्ट्रीय हित में है।ऐसे में मसूद अजहर के मुद्दे पर देश में चल रही बहस बेकार है,खासकर उन टीवी चैनलों और देशभक्तों की फेसबुक वॉल पर जो उसे एयर स्ट्राइक में मृत साबित कर चुके हैं।जब वो मर ही गया है तब किस बात का प्रस्ताव और यदि जिन्दा भी है तो ऐसे किसी प्रस्ताव का क्या अर्थ है? हाफिज सईद और उसका संगठन भी तो प्रतिबंधित हैं इसके बावजूद सबने उसकी रैलियाँ देखी हैं।दुनिया भर के प्रतिबंधों के बावजूद ओसामा का ठिकाना भी पाकिस्तानी सेना के अड्डे के पास ही था न ?

चीन से जैसी अपेक्षा थी उसने किया,किसी के साथ झूला झूलने से अपने हित की बात वो क्यों भूलने लगा भला।याद रखिए इसी सरकार में संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत ने इजराइल के खिलाफ भी वोट दिया है,वही देश जिसके साथ नजदीकियों के किस्सों से न जाने कितने फेसबुक पेज भरे पड़े हैं।मोदी और नेतन्याहू की केमेस्ट्री की बहुतेरी कहानियां हैं लेकिन जब बात यूएन की आती है तो केमिस्ट्री के साथ गणित का भी ध्यान रखना होता है।

येरुशलम को जब इजराइल की राजधानी बनाने की बात अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने की तो यमन और तुर्की इसके खिलाफ प्रस्ताव लेकर आये।अमेरिका और इजराइल से बढ़ती मोदी की नजदीकियों के चलते कुछ लोग मान रहे थे की भारत सरकार ट्रम्प के साथ रहेगी लेकिन भारत ने येरुशलम के विरोध वाले अरबी प्रस्ताव का समर्थन किया।ये तो रही राजधानी की बात लेकिन इससे भी बड़ा काण्ड हुआ हमास पर प्रतिबंध वाली वोटिंग में।इजराइल हमेशा कहता है की हमास उसके नागरिकों को निशाना बनाने वाला आतंकी संगठन है,उसका आरोप है कि इजराइल की जवाबी कार्यवाई के समय हमास फिलिस्तीनी नागरिकों,यहाँ तक की बच्चों और महिलाओं को भी ढाल के रूप में इस्तेमाल करता है।हमास पर प्रतिबन्ध के लिये संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका प्रस्ताव लेकर जो जरूरी दो तिहाई बहुमत से 28 वोट दूर रह जाने के कारण गिर गया।संयुक्त राष्ट्र संघ में अमेरिकी प्रतिनिधि निक्की हेली और इजराइल के दूत की आशाओं के विपरीत ‘मोदी वाले’ भारत ने भी मतदान में अनुपस्थिति दर्ज कराई।हालाँकि इस एक वोट से फर्क पड़ने वाला नहीं था लेकिन अपनी स्थिति तो पता चल गयी फिर बदला क्या है पुरानी विदेश नीति से लेकर आज तक? शायद उस समय इजराइल भारत को पक्के सबूत नहीं दे पाया होगा की हमास आतंकी संगठन है,ठीक वैसे ही जैसे सबूतों के अभाव में चीन ने मसूद के मसले पर वीटो कर दिया।यह अलग बात है कि विदेशी व्यापार के मामले में हमारी इजराइल के साथ हिस्सेदारी 1 प्रतिशत है तो वहीं अरब मुल्कों के साथ लगभग 19 प्रतिशत। फिर हम चीन को क्यों कोसें भाई,हमास के लिए भारत ने जिन बातों का ध्यान रखा होगा कुछ वैसी ही नीति चीन की भी तो होगी ही फिर भी दुनिया के बहुतेरे देशों ने भारत का साथ दिया।पाकिस्तान तो खुद गुड तालिबान और बैड तालिबान की बहस में उलझा पड़ा है,ऐसे में भारत की तरफ ही अपने लोगों को दिखा कर फौज सबको जोड़े हुए है।गलत बात है तो यह की चीन के कदम को मोदी की हार बता कर जो लोग खुश हो जा रहे हैं उनकी भी भूमिका रही है देश की विदेश नीति तय करने में और फिर मौका मिले इसी आशा के साथ वो अब चुनाव की तैयारी भी कर रहे हैं।उन्हें भी और उनके समर्थकों को भी याद रखना चाहिए की सरकारें आती जाती रहती हैं,एक तंत्र स्थायी होता है।