न्यूजीलैंड की मस्जिदों पर हमला आतंकवाद नहीं, प्रतिवाद है

जीन्यूज जैसी तथाकथित राष्ट्रवादी टीवी भी इस बात का रोना रो रही है कि न्यूजीलैण्ड की मस्जिद पर “आतंकवादी” हमला हुआ है ।

कोई भी वादी हो,निर्दोष लोगों की हत्या अपराध है । हिन्दू धर्मशास्त्र तो दोषी और वैरी पर भी तब आक्रमण करने की अनुमति नहीं देता जब वह निहत्था हो ।

किन्तु न्यूजीलैण्ड की मस्जिद पर “आतंकवादी” हमला हुआ है यह बात सरासर गलत है । “आतंकवाद” एक “वाद” है,किसी आतंकवादी के आक्रमण का प्रतिवाद तो वाद नहीं प्रतिवाद है,प्रोटेस्ट है । न्यूजीलैण्ड की मस्जिद पर आक्रमण करने वाले का कोई “आतंकवादी” इतिहास नहीं है,किसी “आतंकवादी” विचारधारा से सम्बन्ध नहीं है,“आतंकवाद” का सहारा लेकर दूसरों पर अपने मत को थोपने का दुराग्रह नहीं है,आक्रमणकारी का कथन है कि यूरोप में इस्लामी शरणार्थियों को जिन लोगों ने पीड़ित समझकर शरण दी उन्हीं शरणार्थियों ने निर्दोष आश्रयदाताओं पर “आतंकवादी” आक्रमण करके हत्यायें की, उसका “बदला” न्यूजीलैण्ड में लिया है ।

बदला लेने का यह तरीका गलत है,किन्तु बदला लेने को “आतंकवाद” कहना भी गलत है । ईसाईयों में सबसे बड़ा आतंकवादी तो रोम का पोप रहा है जिसने पूरे संसार को ईसाई बनाने के लिये आक्रमण करने की आज्ञा दी थी और गैर−ईसाईयों पर डेढ़ हजार वर्षों तक आतंक बरपाया । पोप को तो कोई भी “आतंकवादी” नहीं कहता !आज पोप सुधर चुका है,अब केवल पैसे के बलपर धर्मान्तरण कराता है,इस कार्य के लिये हिंसा की आज्ञा दे इतनी शक्ति नहीं रखता ।

आज के संसार में “आतंकवाद” केवल एक ही सम्प्रदाय का घोषित दर्शन है जो उसकी आसमानी पुस्तक में स्पष्ट लिखा है,और राजनीति के क्षेत्र में केवल एक ही वाद से “आतंकवाद” का सम्बन्ध है जो उसकी पवित्र पुस्तक के पहले वाक्य में ही दर्ज है — “क्रान्ति बन्दूक की नाल से निकलती है” (माओ की ‘रेड बुक’) । चीन के भीतर अब माओवाद को प्रश्रय नहीं मिलता किन्तु भारत में वह माओवाद को बढ़ावा देता है । अतः मसूद अजगर के “आतंकवाद” से माओ के “आतंकवाद” की दोस्ती स्वाभाविक है — बशर्ते मामला भारत का हो । चीन के भीतर तो सारे मसूद अजगरों को सुधारगृहों में बन्द रखा जाता है ।

ब्रिटेन,रूस,फ्रांस,जर्मनी,ऑष्ट्रेलिया,आदि के समाचार चैनल मैं अक्सर देखता हूँ,वे सब “इस्लामी आतंकवाद” शब्दावली का प्रयोग करते हैं । “इस्लामी आतंकवाद” से सबसे अधिक पीड़ित देश है भारत,किन्तु भारत संसार का एकमात्र गैर−इस्लामी देश है जो “इस्लामी आतंकवाद” शब्द का प्रयोग करने से कतराता है और शान्तिदूत मजहब के वाद का कोई प्रतिवाद करे तो उस प्रतिवादी को झट से आतंकवादी घोषित कर देता है ।

अतः भारतीय चैनलों को सन्देश भेजिये कि न्यूजीलैण्ड की मस्जिद में निहत्थे नागरिकों पर आक्रमण गलत और निन्दनीय है किन्तु वह आतंकवाद न होकर उसका प्रतिवाद है,गलत तरीके का प्रतिवाद । आतंकवाद का सही उपचार तो चीन सिंकियांग के पुनर्शिक्षा−केन्द्रों में कर रहा है । किन्तु भारत में “इस्लामी आतंकवाद” को चीन बढ़ावा देता है । पाकिस्तान की औकात नहीं है कि अपने बल पर भारत को आँख भी दिखा सके । सबकुछ चीन करा रहा है,भारत को शक्तिशाली राष्ट्र बनने से रोकना चीन के आर्थिक वर्चस्व की नीति का अङ्ग है । भारत का तीव्र आर्थिक विकास एकमात्र दीर्घकालीन समाधान है,जिसके लिये स्थिर राष्ट्रवादी सरकार का होना आवश्यक है ।

आतंकवाद दो प्रकार के होते हैं — अच्छा और बुरा । बुरा वह है जो निर्दोष लोगों पर अत्याचार करे । अच्छा वह है जो साधुओं का परित्राण करे और दुष्कृत के विनाश हेतु युग−युग में प्रकट हो । अच्छे आतंकवाद द्वारा ही बुरे आतंकवाद को समाप्त किया जा सकता है । यह देवासुर संग्राम है जिसके पात्र बदलते रहते हैं किन्तु संग्राम कभी समाप्त नहीं होता, क्योंकि स्थान खाली होने पर उसे भरने के लिये निचली योनियों से जीव मानवयोनि में चले आते हैं किन्तु दानव−संस्कार लेकर आते हैं । न्याय−व्यवस्था,पुलिस,सेना,आदि भी अच्छे आतंकवाद के अन्तर्गत आते हैं । आतंकवाद के वाद को प्रतिवाद ही सुधार सकता है,किन्तु प्रतिवाद को वाद की नकल नहीं बनने दे — अतः न्यूजीलैण्ड का प्रतिवाद गलत है । वैध प्रतिवाद की क्षमता को बढ़ायें । अधर्म का अधार्मिक प्रतिवाद भी अधर्म है ।

विनय झा के फेसबुक वॉल से साभार।