लोकतंत्र को मिला आशीर्वाद


#1


लोकतंत्र में जनता ही जनार्दन कही जाती है किंतु यह भी सच है कि आमतौर पर लोक एवं तंत्र के बीच एक गहरी खाई है।यह खाई कभी सत्ता की हनक तो कभी सुरक्षा के हवाले से बना दी जाती है।इसके बाद प्रोटोकॉल भी होता है जिसके नाम पर कुछ नियम बना दिए जाते हैं।इन सबके बीच पद्म पुरस्कारों के वितरण के समय एक ऐसी तस्वीर निकल कर आयी है जो संसद और राष्ट्रपति भवन में भी हमेशा के लिए उचित स्थान की हकदार है।
यह तस्वीर देखने वालों को हमेशा प्रेरित करती रहेगी और विवश करती रहेगी सोचने को की असल एक्टिविस्ट किसे कहते हैं।वह जिसका किसी फैशनेबल ‘वाद’ से कोई सम्बन्ध नहीं,यहाँ तक की उन्हें खुद नहीं पता होगा की एक्टिविज्म,फेमिनिज्म जैसे शब्दों के क्या मतलब होते होंगे।उनका जो कार्य है उसके धूल बराबर भी वो लोग नहीं होंगे जो एक्टिविस्ट का तमगा लिए हुए अपनी दुकानदारी चलाते हैं।गमलों में जमे हुए,कटे-छंटे, तराशे गए लोग,पर्यावरण के नाम पर दुनिया भर में सेमीनार और सम्मेलनों के टिकट के जुगाड़ में लगे हुए लोग।इन सबके दायरे से बहुत बड़े आभामंडल वाली,कर्नाटक की ‘वृक्ष माता’ सालुमारदा थिकम्मा ने जब भारत के राष्ट्रपति के माथे पर स्नेह से हाथ रखा तो निकल कर आई देश के लोकतांत्रिक इतिहास की सबसे नायाब तस्वीर,जहाँ सारे प्रोटोकाल धरे रह गए,रहा तो केवल राष्ट्रपति को मिला मातृवत स्नेह।हम आभारी हैं उस माँ के जिन्होंने लोकतंत्र को आशीर्वाद दिया।