अमेरिका की दृष्टि में पाकिस्तान की सही जगह


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आज़ादी के बाद से भारत की कथित गुटनिरपेक्ष नीतियां और फिर बाद में सोवियत संघ के तरफ झुकाव के चलते पाकिस्तान अमेरिका का प्रिय देश बन गया था।अमेरिका कभी तिब्बत में गुप्त अभियान चलाना चाहता था तब पाकिस्तान ने उसे अपनी जमीन दी।हालाँकि यह अभियान सीईआए के काफी महत्वाकांक्षी असफल अभियानों में शामिल हो गया लेकिन उसके बाद भी क्षेत्र में सोवियत संघ के प्रभाव की काट के लिये अमेरिका पाकिस्तान को अपना बगलबच्चा बनाये रहा।अफगानिस्तान में पहले सोवियत और फिर तालिबान से जूझने के दौरान भी पाकिस्तान की हर चालबाज़ी के बावजूद उसे साथ रखना भी अमेरिका की मजबूरी थी।हालांकि अब ट्रम्प प्रशासन मान रहा है कि पाकिस्तान पर अरबों डॉलर लुटाने के बावजूद भी अमेरिका को धोखा ही मिला है।
इसी कड़ी में अमेरिका के विदेश मंत्री माइक पोम्पोई पाकिस्तान को वर्तमान समय के अमेरिका के लिए मौजूद टॉप पांच खतरों में से एक मानते हैं। फॉक्स न्यूज़ के संवाददाता ने उनसे सवाल पूछा की जलवायु परिवर्तन को वो खतरे वाली लिस्ट में किस स्थान पर रखते हैं तो जवाब में उन्होंने अपनी लिस्ट में बस तीन खतरों का नाम लिया जिनके बारे में वो सोचते हैं,इनमें चीन और उत्तर कोरिया के साथ पाकिस्तान भी है।आशा है इमरान खान का नाम नोबल प्राइज़ कमेटी को भेजने से पहले उनके शुभचिंतक इस लिस्ट से बाहर आने के उपायों को अमल में लाने के बारे में जरूर विचार करेंगे।इतना तो तय है कि चीन के प्रभावी दखल के चलते अब पाकिस्तान को अमेरिका की बहुत जरूरत नहीं है,वैसे भी पाकिस्तानी कहते रहे हैं कि उन्हें अमेरिका की जरूरत नहीं,वरन अमेरिका को पाकिस्तान की जरूरत है।यह भी सच है कि अभी तक अमेरिका में पाकिस्तान लॉबी बहुत प्रभावी रही है लेकिन ऐसा पहली बार हो रहा है कि वहाँ की सरकार खुल कर पाकिस्तान को निशाने पर ले रही है।
पोम्पोई ने चीन,पाकिस्तान और उत्तर कोरिया का नाम स्पष्ट रूप से लेते हुए अब रेखा खींच दी है,जाहिर है पाकिस्तान का इससे निकलना आसान नहीं होगा।अफगानिस्तान और मिडिल ईस्ट के कुछ देशों में अपने खतरनाक मिशन चला रहे अमेरिकी अगर पाकिस्तान के कुछ इलाकों में भी वीडियो गेम की तर्ज़ पर कुछ खेल बैठें तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।विदेश मंत्री पोम्पोई पूर्व फौजी भी हैं और खतरों से निपटने में अमेरिकी फौजों का इस्तेमाल करना भी पड़े तो चीन और उत्तर कोरिया की जगह पाकिस्तान के कबीलाई इलाके आसान निशाने होंगे।हालाँकि जिस संदर्भ में पाकिस्तान का नाम लिया गया उसमें कुछ और देश भी आते हैं किंतु विदेश नीति में सीधे नाम लेने का बहुत कुछ मतलब होता है।देखा जाय की इस बयान के बाद कब पाकिस्तान के सेना प्रमुख को अमेरिकी दौरे की अनुमति मिलती है कि वो जाकर सफाई दे सकें क्योंकि उस देश में चुनी हुई सरकार का कोई मतलब नहीं,वहाँ देश की फौज नहीं होती वरन लोकतंत्र की आड़ में अपनी कठपुतालियों के सहारे फौज देश चलाती है।