एक पूर्व मुख्यमंत्री की आत्महत्या: लोकतंत्र की कालिख


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टिकट न मिलने से नाराज़ होकर मणिपुर के एक भाजपा विधायक ने पार्टी छोड़ दी। उन्होंने राज्य में रैलियों और पार्टी फंड में दिए गए लाखों रुपयों को भाजपा से वापस मांगा है। यह एक अच्छी पहल है, क्योंकि देश में लोकतंत्र अब पैसों का ही खेल है। जनता के वोटों के दम से सत्ता पर काबिज होकर अपनी जेबी हुकूमत चलाने की ललक ही है लोकतंत्र, जहां नीतियों और विचारधारा का कोई मतलब नहीं है।

मंचों से एक-दूसरे के प्रति जहर उगलने वाले कब गलबहियां करने लगते हैं, पता ही नहीं चलता। जनता के सामने तमाशा देखने के अलावा कोई चारा नहीं होता और वो हाथ मलते हुए अगले चुनाव का इन्तजार करती रहती है, जब फिर उसे लोकतंत्र के नाम पर ठगा जाना होता है। कभी जिस महबूबा को अलगाववादी मुख्यधारा में अपनी आवाज़ समझते थे, वह भाजपा का साथ पाकर मुख्यमंत्री बन गईं। तो सत्ताईस साल- यूपी बेहाल के नारों पर चूना पोत कर कांग्रेस अखिलेश यादव के साथ खड़ी है। शीला दीक्षित कहां गईं, इसका पता ही नहीं। मद्रास में लोकतंत्र के नाम पर जयललिता की मजार पर कसमें खा-खाकर जो कुछ हुआ, वह सब देख ही रहे हैं।

मुख्यमंत्री के सुसाइड नोट ने दिखाया लोकतंत्र को उसका असल चेहरा

इन हालातों में अरुणाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कलिखो पुल का आत्महत्या के पहले लिखा गया नोट सही मायने में भारतीय लोकतंत्र की व्याख्या करता है, लेकिन अफ़सोस की बात है कि उस पर न भाजपा चर्चा कर रही है, न ही कांग्रेस क्योंकि लपेटे में दोनों हैं। और निशाने पर है सुप्रीम कोर्ट भी। आश्चर्य की बात है कि सोशल मीडिया पर भी इसकी चर्चा नहीं हो रही है, क्योंकि यहां भी जिन लोगों का वर्चस्व है या कहिए की बड़ी फैनफालोइंग है और अपने-अपने एजेंडे को वायरल कराते हैं, उन लोगों के भी अपने तयशुदा खांचें हैं, जिसके भीतर एक खूंटा गड़ा हुआ है, जिससे उनकी रस्सी बंधी हुई है, जो उन्हें बाहर निकलने नहीं देती।

हम याद करें रोहित वेमुला की आत्महत्या को, तो उनका सुसाइड नोट भी एक दस्तावेज है। उस आत्महत्या को जब एक बड़ा वर्ग सांस्थानिक हत्या कहता है, एक पूर्व मुख्यमंत्री के नोट को लोकतान्त्रिक हत्या कहने में क्या आपत्ति है भाई? इस पर तो देश में बड़ी बहस होनी चाहिए। बुद्धिजीवी बनने का ढोंग करने वालों से लेकर आम जनता के बीच भी इसे विस्तार मिलना चाहिए, ताकि जिस लोकतंत्र पर हमें गर्व है वह कितना नीचे जा चुका है सबको पता चले।

नेतागण देखते हैं अपना राजनीतिक लाभ? अपना काम बनता, भाड़ में जाए जनता!

अरुणाचल प्रदेश में भाजपा की सरकार है और पेमा खांडू मुख्यमंत्री हैं। पेमा ने लोकतंत्र के क्षेत्र में विश्व रिकॉर्ड बनाया है। पहले वह कांग्रेस के मुख्यमंत्री थे, फिर पार्टी के 44 विधायकों में से 43 के साथ पार्टी छोड़ दी और पीपुल्स पार्टी ऑफ अरुणाचल में शामिल हो गए। विधानसभा अध्यक्ष ने भी इनके साथ ही दल-बदल किया था। कुछ समय बाद इनका फिर ह्रदय परिवर्तन होता है और ‘मोदी जी नीतियों से प्रभावित’ होकर उन 43 में से 33 को लेकर दिसंबर 16 के आखिर में भाजपा में शामिल हो गए। भाजपा के पास 12 विधायक पहले से थे और दो निर्दलीय भी साथ आ गए। इस प्रकार 60 सदस्यों वाली विधानसभा में 49 विधायकों के समर्थन से पेमा खांडू भाजपा के मुख्यमंत्री बन गए। पेमा खांडू सन 2005 में कांग्रेस के प्रदेश महासचिव बने थे और 2011 में यशस्वी मुख्यमंत्री दोरजी खांडू की हेलीकाप्टर दुर्घटना में मौत के बाद मंत्रिमंडल में शामिल हुए। फिर विधानसभा के लिए दोरजी खांडू की सीट से निर्वाचित हो गए। दोरजी इनके अपने पिताजी थे, जिनके बारे में कहा जाता है कि फ़ौज के एक साधारण सिपाही थे और रिटायर होने के बाद राजनीति में आए। मुख्यमंत्री बनने के बाद उनकी कोठियां ईटानगर, कलकत्ते से लेकर दिल्ली तक में खड़ी हो गईं और चौदह-पंद्रह लाख की जनसंख्या वाले राज्य के इस सीएम पर घोटालों के जरिए हजारों करोड़ इकठ्ठा करने के आरोप लगे। उनके कार्यकाल के कई घोटालों के मामले हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक में लंबित हैं। तो उसी कांग्रेसी पूर्व मुख्यमंत्री के खानदानी कांग्रेसी बेटे पेमा जी को अचानक मोदी जी की नीतियों से प्रेम हो जाता है और वो विधायकों सहित पाला बदल लेते हैं। दिल्ली की मीडिया में बस एक खबर ही बन जाती है की अरुणाचल में भी भाजपा सरकार।

कलिखो पुल- एक मजदूर से मुख्यमंत्री तक का कठिनाइयों भरा सफर

लेकिन इन सबके बीच चर्चा नहीं होती कलिखो पुल की। पुल भी लम्बे समय तक कांग्रेस और राज्य की सेवा करने के बाद आत्महत्या कर लिए जिनके शुरुआती जीवन का संघर्ष और राजनीति में आने के बाद जो कुछ हुआ वह सबको पढ़ना चाहिए। 47 साल की उम्र में मुख्यमंत्री बन जाने के बाद सिस्टम से हार कर आत्महत्या कर लेना उतना ही चौंकाता है, जितना इस मामले में दिल्ली से जुड़े उन लोगों की चुप्पी जिनके बारे में कहा जाता है कि देश चलाते हैं।

कलिखो पुल का जन्म अरुणाचल प्रदेश के हवाई जिले के वाल्ला बस्ती गाँव में एक काफी गरीब घर में हुआ था। इलाका भी काफी पिछड़ा और गरीब था। उस समय गांव से शहर पहुंचना भी आसान नहीं था, जिसके चलते बीमार होने पर लोग बिस्तर पर ही दम तोड़ देते थे, क्योंकि चिकित्सा सुविधाओं तक उनकी पहुंच ही नहीं थी। जन्म के तेरह महीने बाद मां मर गईं और छह साल की उम्र में पिता चल बसे, जिससे पालन-पोषण एक रिश्तेदार ने किया। वहां भी इनका काम दिनभर जंगल से लकड़ी बीनना रहता था और रोटी के बदले परिजनों का उत्पीड़न आम बात थी।

अपने नोट में पुल इस बात का जिक्र करते हुए लिखते भी हैं कि- ‘जन्म से हर कोई खाली हाथ आता है और खाली हाथ ही जाता है, मैंने बचपन से ही जिंदगी से लड़ना सीखा, फिर वह चाहे रोटी की बात हो या हक की।’ जहां पल रहे थे, वहां की दुश्वारियों से तंग आ कर एक दिन ये भाग निकले और हवाई जिला मुख्यालय आ गए जहां ये एक बढ़ई के हेल्पर बन गए। इस बारे में भी उन्होंने लिखा है की गरीबी और लाचारी की मार झेलते हुए मैंने मजदूरी का काम किया और पैंतालिस रुपए महीने कमाता था। कारपेंटर का वह सामान इनके साथ अंतिम समय तक रहा, ताकि वह समय कभी भूलने न पाएं।

आप उनकी कथा में एक आम गरीब हिन्दुस्तानी का ही जीवन देखते हैं, लेकिन वो कुछ अलग मिट्टी के भी बने थे और कुछ संयोग ऐसे बनते गए की उन्होंने अपना एक स्थान हासिल किया। राजनैतिक दृष्टि से देखें तो राज्य से सर्वोच्च पद तक भी गए। लेकिन कैसे? हवाई में मिडिल स्कूल के हेडमास्टर सिन्हा जी ने स्कूल में रिपेयरिंग के लिए एक दिन बढ़ई बुलाया जिसके साथ हेल्पर के रूप में एक बच्चा भी था। बच्चे को काम करता देख हेडमास्टर साहब ने उससे पढ़ने लिखने की बात की तो उस बच्चे ने पेट के लिए अपनी मजबूरी बतलाई। ये कलिखो पुल थे, सिन्हा जी शाम को परिसर में ही प्रौढ़ शिक्षा केंद्र चलाते थे, जहाँ वो हर उम्र के लोगों में अक्षर ज्ञान बाँटते थे। पुल उस सायंकालीन कक्षा में आने लगे और शिक्षा के प्रति उनकी लगन से गुरूजी का उत्साह भी बढ़ने लगा, लेकिन समस्या यह थी रेगुलर क्लास में नियम के हिसाब से उनका नाम निचली कक्षा में ही लिखा जाता, जिसके हिसाब से उनकी उम्र बहुत अधिक थी। एक समारोह के लिए स्कूल में शिक्षा मंत्री और साथ में बड़े अधिकारी का आगमन होना था। हेडमास्टर साहब ने अपने मेधावी छात्र पुल को अंग्रेजी में एक भाषण लिख कर दिया और कहा कि इसे कायदे से याद करके सुना देंगे तो मंत्री जी के कहने से बड़ी क्लास में नाम लिख लिया जाएगा। कार्यक्रम में पुल ने उस भाषण को बहुत अच्छे से सुनाया और राष्ट्रगान गाने की जिम्मेदारी भी निभाई, जिसका नतीजा वही हुआ जो हेडमास्टर चाहते थे। मंत्री जी ने उनका नाम छठी कक्षा में लिखने को कहा और उप कमिश्नर डी.एस.नेगी तो इतने प्रभावित हुए की वह इस बच्चे के युवक हो जाने तक सहयोग करते रहे। हां, शिक्षा मंत्री खापिसो क्रोंग वही नेता थे जिन्हें बाद में पुल ने अपने पहले विधानसभा चुनाव में हराया। नियमित स्कूल में दाखिला तो मिल गया, लेकिन फिर जिंदगी की गाड़ी चलती कैसे तो इस समस्या का समाधान करने के लिए फिर हेडमास्टर सिन्हा सामने आये। पुल को रात में चौकीदारी का काम मिला और सुबह पांच बजे तिरंगा फहराने और शाम को पांच बजे उतारने का भी काम मिला, जिसके एवज में उन्हें दो सौ बारह रुपए महीने मिलने लगे। इससे उनकी तमाम जरूरतें हल होने लगीं। युवा कलिखो पुल ने कभी सड़क के किनारे खड़े होकर भारत के प्रधानमंत्री राजीव गाँधी को भी एक तिरंगा भेंट किया था, जिस घटना को याद करते हुए उन्होंने बाद में कहा भी था की राजीव जी ने अपने भाषण में तब जो कहा कि दिल्ली से चले एक रुपए में से पच्चीस पैसे ही यहां तक आते हैं, तो इस स्थिति को सभी विधायक-मंत्री अब भी बनाए रखना चाहते हैं। हां, इस तरह से जिंदगी से लड़ते हुए पचास बसंत देखने से पहले ही मुख्यमंत्री आवास में फंदा बना कर झूल जाने वाले कलिखो पुल का नोट एक अहम दस्तावेज है जिसे पढ़ने के बाद आप निराशा के गर्त में डूब जाएंगे। यहां उस आवास के उस खास कर्मचारी की चर्चा नहीं होगी जो पुल के मरने के एक महीने बाद उसी आवास में अपने गले में फंदा डाल कर लटक जाता है। राजनीति कितनी क्रूर होती है यह बता गए पुल।

हेडमास्टर सिन्हा और अधिकारी नेगी के प्रयास से पुल बोर्डिंग स्कूल में आ गए थे और स्कूली शिक्षा खत्म होने के बाद उन्होंने पान-सिगरेट का खोखा लगाया। कारपेंटर के साथ ही ईंट-गारे के मिस्त्री का भी काम करते रहे और ग्रेजुएशन भी करते रहे। अर्थ शास्त्र और फिर लॉ में ग्रेजुएशन किया और इस दौरान छोटे ठेके भी लेने लगे थे। अपनी मेहनत से इन्होने कुछ पूँजी इकठ्ठा कर ली और तीन कमरे का पक्का घर भी बनवा लिया था। फिर राजनीति में आये और पहली बार गेगोंग अपांग सरकार में वित्त मंत्री बने। सन 14 में गठित नबम तुकी सरकार में स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय मिला।

भ्रष्ट सिस्टम के आगे हारे मुख्यमंत्री

इन्होंने ड्रग माफिया के खिलाफ बड़ा अभियान चलाया और स्वास्थ्य विभाग में भी सुधार के कई कार्यक्रम चलाए जिनमें भ्रष्टाचार के खिलाफ इन्होने मोर्चा खोला, जिसका पार्टी के भीतर विरोध होने लगा। अप्रैल 2015 में पार्टी विरोधी हरकतों के आरोप में ये पार्टी से निकाल दिए गए, जिसके अगले दिन इन्होंने प्रेस कांफ्रेंस करके जन वितरण प्रणाली में हजारों करोड़ के खाद्यान घोटाले का आरोप लगाया। इस मामले में कांग्रेसी मुख्यमंत्री दोरजी और उनके बेटे अभी वाले भाजपाई मुख्यमंत्री पेमा खांडू का भी नाम है और तमाम मुकदमे चल रहे हैं। यह वही कमाऊ विभाग है, जो उत्तर प्रदेश में सपा सरकार में राजा भइया के पास रहता है। शायद आपको याद हो कि मुलायम सरकार में राजा भइया के खुद पीए ने ही मंत्री जी और उनकी पत्नी के ऊपर घोटाले का आरोप लगाया था। जांच भी हुई थी और अखिलेश सरकार में भी मंत्रालय ठाकुर साहब को ही मिला। देश का शायद ही कोई राज्य हो, जिसमें इस विभाग में घोटाले न होते हों। लेकिन होता जाता कुछ नहीं है, क्योंकि इसमें गरीबों के हिस्से का अन्न हजम किया जाता है।

एक मुख्यमंत्री की लोकतांत्रिक हत्या!

जब कलिखो पुल ने बगावत की तो उनके साथ कांग्रेस के काफी विधायक आ गए और पांच बार कांग्रेस विधायक रहे कलिखो पुल मुख्यमंत्री बन गए। ये साढ़े चार महीने मुख्यमंत्री रहे, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने नबाम सरकार की बर्खास्तगी को अवैध करार दिया, यानी उस के बाद बनी पुल सरकार ही निरस्त हो गई और पूरे देश में लोकतंत्र के विजय की खबरें चलने लगीं। लोकतंत्र की विजय के प्रतीक में नबाम तुकी फिर मुख्यमंत्री बन गए। यह अलग बात है कि कुछ ही दिनों बाद पार्टी में बढ़ रहे असंतोष को देखते हुए कांग्रेस आलाकमान ने तुकी की जगह पेमा खांडू को मुख्यमंत्री बना दिया जो विधायकों समेत आज भाजपा में शामिल होकर राज्य में कमल खिला रहे हैं। कहां है इस कहानी में लोकतंत्र? सामने से दिखने वाले लोकतंत्र के पीछे की कहानी पुल ने अपने नोट में लिखी है, जिसे डाइंग डिक्लेरेसन क्यों नहीं माना जाना चाहिए?

चीफ जस्टिस से लेकर राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री हैं मौन, इस मामले पर क्यों साधी हुई है चुप्पी?

9 अगस्त को पुल की आत्महत्या की खबर जब सामने आई तो भीड़ ने उनके बंगले से सटे मंत्रियों के बंगले में तोड़फोड़ की, क्योंकि उसे लग रहा था कि पुल जैसा आदमी आत्महत्या कर ही नहीं सकता। पुल के कमरे से ‘मेरे विचार’ नामक 60 पेज का नोट मिला, जिसे पढ़ने के बाद राज्यपाल राजखोवा ने राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखकर उसमें दर्ज ब्योरों और पुल की मौत की जांच कराने की मांग की। नतीजा यह रहा की राज्यपाल हटा दिए गए।
अब वह नोट जनता के सामने आ गया है। क्विंट और वायर की साईट पर आने के बाद अखबार भी उस पर लिख रहे हैं। पुल की पत्नी दांगविम्सई पुल दिल्ली में प्रेस क्लब में पत्रकारों के सामने सीबीआई जांच की मांग कर रही हैं। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस से लेकर राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री को पत्र लिख रही हैं, लेकिन सब मौन हैं। तमाम गैरजरूरी मुद्दों पर भी ललकार लगाने वाले प्रधानमंत्री खामोश हैं और कांग्रेस पार्टी सहित देश बदलने के सपने दिखाने वाले राहुल जी भी अभी तक कुछ नहीं बोले हैं, तो आखिर में बोलेगा कौन? करुणानिधि और मुलायम सिंह ? हां, चीफ जस्टिस ने जवाब भेज दिया है कि उन्हें मामले की जानकारी नहीं है और पेमा खांडू ने कैबिनेट बैठक करके पुल की मौत पर दुःख व्यक्त करते हुए उनकी तरफ से लगाए गए आरोपों को बेबुनियाद बता दिया है और यह भी कहा है की वह किसी भी तरह की जांच के लिए तैयार हैं। सवाल है कि जाँच करेगा कौन ? वही तंत्र न जिससे निराश होकर बर्खास्तगी के महीने भर के भीतर पुल ने आत्महत्या कर ली थी।

अब बात करते हैं उनके नोट की- ये है दिल दहला देने वाली हमारे लोकतंत्र की कड़वी सच्चाई अपने जीवन के संघर्षों की कथा बताने के बाद पुल लिखते हैं कि जब दिसंबर 94 में वह राजनीति में आए तो उन्होंने अपना ट्रेडिंग लाइसेंस सरेंडर कर दिया, क्योंकि राजनीति में आ जाने के बाद व्यवसाय करना उनके हिसाब से ठीक नहीं था। सबसे पहले मुख्यमंत्री बनने का मौका 2007 में आया, लेकिन ठुकरा दिया, जिसके बाद 2011 में भी अवसर था, लेकिन मुझे लगा कि यहां सब लोग एक-दूसरे की भलाई में ही लगे हैं, जिनके लिए जनता का कोई मतलब नहीं। केवल अपनी कमाई का ही ख्याल रखना है। मुझे लगता था कि मेरे साथी मंत्री और विधायक मुझे सिस्टम से, नीति से, कानून से और संविधान से चलने नहीं देंगे। तीसरी बार मैंने मौका स्वीकार कर लिया, लेकिन साथियों को यह बात मंजूर नहीं हुई क्योंकि उनके लिए विधायक बनने का मतलब कुछ और था। 23 साल के राजनैतिक जीवन में मैंने देखा है कि सारे फैसले राजनीति की नजर से ही लिए गए और विधायक तथा मंत्री हमेशा आपस में हिसाब-किताब लगा कर एक दूसरे को लाभ देने एवं खुश करने में भी लगे रहे।

आगे उन्होंने ने सुसाइड नोट में लिखा कि साढ़े चार महीने के कार्यकाल में मैंने मंत्रियों को ट्रांसफर पोस्टिंग के लिए पैसे लेने से मना किया। राज्य के हित में समस्त सरकारी कार्यों में कमीशन लेने पर रोक लगाने की कोशिश की। पंद्रह लाख की जनसंख्या वाले राज्य में साठ विधायक हैं, जिनमें सबको मंत्री ही बनना है। जनता को इनसे पूछना चाहिए की इन्हें पैसा छापने की मशीन मिल जाती है क्या? दोरजी खांडू अपने करोड़ों रुपए छोड़ कर चले गए। इन पैसों से न तो जिंदगी खरीदी जा सकती है, न ही दूसरी दुनिया में ले जा सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट में केस की बाबत लिखते हैं कि मेरे खिलाफ फैसला जो आया तो उसके लिए नबाम तुकी और पेमा खांडू ने नब्बे करोड़ रुपए खर्च किए। मेरे पक्ष में फैसला देने के लिए मुझसे सम्पर्क किया गया और मुझसे 86 करोड़ रुपए मांगे गए। मैं कहाँ से देता, मैंने भ्रष्टाचार किया नहीं था, कमाया नहीं था। अपनी सरकार बचाने के लिए जनता के पैसों का दुरुपयोग क्यों करता ?.. अब यहाँ उन्होंने कुछ जजों और देश के कुछ बड़े नेताओं का भी जिक्र किया है। इसको पढ़ते समय आप याद करिए मुलायम सिंह का वह बयान जिसमें वह कहते हैं कि अमर सिंह ने उन्हें जेल जाने से बचाया था। अगर आपकी अक्ल किसी पार्टी के खूंटे बंधी है, तो गडकरी का शरद पवार के बारे में पुराना बयान याद कर लीजिए कि चार काम हम उनके करते हैं, तो चार काम वो हमारे। और फिर याद करिए कि जिस पार्टी को मोदी जी ने नेचुरल करप्ट पार्टी कहा था, उसके मुखिया को भारत रत्न के बाद देश का सबसे बड़ा नागरिक सम्मान दे दिया। क्या ढाई साल में सब माफ हो गया?

"कानून पूरी तरह खुद ही न्याय का दलाल बन बैठा है"

पुल पीडीएस घोटाले की बात लिखते हुए कहते हैं कि दोरजी जिन्दा रहते तो जेल जाते। साथ ही अभी जो मुख्यमंत्री हैं, वो भी एक दिन जेल जाएंगे, क्योंकि सरकारी वितरण प्रणाली का समूचा चावल असम में बेच दिया गया और गांवों में एक दाना नहीं पहुंचा। आपदा राहत घोटालों की भी उन्होंने खूब चर्चा की है कि कैसे केंद्र से आती सारी मदद डकार लेते रहे नेता लोग और क़िस्त दिल्ली तक पहुंचाई जाती रही। हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट्स में भी हो रहे खेल की चर्चा उनके पत्र में हैं। उन्होंने खुद दोरजी के दबाव में दिल्ली में कांग्रेस कोषाध्यक्ष के पास करोड़ों पहुंचाने की बात कही है। आलाकमान और मीडिया भी पूरी तरह इसी भ्रष्टाचार के धन से खरीदी जा चुकी है। सभी योजनाओं में सत्तर प्रतिशत तक की दलाली की बात लिखते हुए वो अपनी निराशा बता रहे हैं कि वो लाचार होकर इस सिस्टम में कुछ कर ही नहीं सकते। लिखते हैं कि जिनके पास अपना घर भी नहीं था, वो विधायक बनते ही कोठियां कहां से खड़ी कर लेते हैं। यह सब पढ़ते हुए आप को अपने इलाके के नेताओं की तस्वीरें दिखने लगेंगी। शायद यही कारण की ‘माँ भारती के लाल’ होते हुए भी पुल के ऊपर कोई चर्चा नहीं होती। पुल ने लिखा है कि सरकार बचाने के लिए विधायकों ने पंद्रह-पंद्रह करोड़ रुपए मांगे। मैं कहाँ से देता? आज नेता सेवक नहीं दलाल बन गए हैं। सब बिजनेसमैन हो चुके हैं। कानून से भी पूरी तरह निराश होते हुए लिखते हैं कि आज कानून पूरी तरह खुद ही न्याय का दलाल बन बैठा है।

आत्महत्या की ये दुखद घटना हमारे ‘सच्चे’ लोकतंत्र को बयां करती है

राज्यों और केंद्र के सम्बन्धों की भी बहुत चर्चा होती है और एक आम राय है कि दोनों जगह एक ही पार्टी की सरकार रहने पर सहूलियत होती है। ऐसा मानने वालों को निराशा होगी, क्योंकि पुल अपने नोट में लिखते हैं कि राज्य को केंद्र से एडवांस लोन लेने के लिए सीएम के कहने पर एक केन्द्रीय मंत्री को छ: करोड़ देना पड़ा। पार्टी फंड और केन्द्रीय मंत्रियों को उनके हिस्से अलग से पहुंचाने पड़ते थे। अब आप सोचिए कि यह कैसा लोकतंत्र है। और उठाए रहिए अपनी-अपनी पार्टियों के झंडे। गैर सरकारी संस्थाओं के बारे में भी उन्होंने अपने नोट में लिखा है और कहते हैं कि ये लोग केवल काम में अडंगा लगाने और उसके बाद दलाली करके अपनी जेब भरने में ही लगे हुए हैं। यह नोट पढ़ते समय किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को बहुत धक्का लगेगा, क्योंकि अभी तक हम लोग समझते थे कि आम जनता ही त्रस्त है, लेकिन देख लीजिए कि सत्ता के शिखर पर भी क्या हालत है। याद करिए हालिया मद्रासी लोकतंत्र में रिसॉर्ट में
ठेले गए विधायकों के बारे में जो लोग माननीय समझे जाते हैं। मुझे पक्का भरोसा है कि कलिखो पुल ने जितने भी आरोप लगाए हैं उस पर किसी नेता में हिम्मत नहीं है कि मंच से कुछ बोल सकें, पत्रकारों के सवालों का जवाब दे सकें, क्योंकि ख़ून के छींटे सबके ऊपर पड़े हैं। एक मजदूर से मुख्यमंत्री तक की यात्रा और फिर आत्महत्या तक की कहानी है हमारे सच्चे लोकतंत्र की। इस यात्रा को समझ लेने के बाद एक पल को आप भी उदास हो जाएंगे और भूल जाएंगे अपने-अपने नेताओं की तमाम दलीलों को और आपको सारे के सारे अपराधी दिखने लगेंगे। कायदे से देखिए तो सही और कलिखो पुल की यात्रा में आप भी कहीं किनारे खड़े दिखेंगे। वो तो यह लिखते हुए चले गए की “जनता समझे, जागे। समाज, राज्य और देश में हो रहे गंदे नाटक और लूटपाट और भ्रष्ट तंत्र को समझे।” सवाल है कि जनता समझेगी? उसके हाथ में क्या है? हाथ में स्याही लगवा कर बटन दबा कर बैठ जाने के सिवाय?