अजुधिया, जन्मभूमि दर्शन


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राम जन्मभूमि और अयोध्या का दर्शन, भ्रमण करने निकले मार्कंडेय गुप्त पुलिस के फ्लैग मार्च में फँस गए, पत्रकारों से पूछा की शहर का माहौल कैसा है तो सबका जवाब था की जैसा रहता है। कुछ दूर साथ चलने के बाद लगा की इस जुलूस में शामिल होकर नगर को समझा नहीं जा सकता तो एक गली में घूम गए। जिधर जैन बन्धु मिष्ठान भण्डार का बोर्ड लगा था, छोटू ने कपड़ा मार कर बैठने की जगह साफ़ की।

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जय राम जी की, पैसा दीजिये, आगे बढ़िए महराज। पूछ रहे हैं क्या बनेगा !

दो समोसे का ऑर्डर देकर ये पानी पीने लगे, काउंटर पर बैठे बुज़ुर्ग ने पूछा की साहब सीआईडी से हैं क्या ? क्योंकि यात्री लोगों का तो आमद बंद है और पुलिस चाहे पत्रकार होते तो जुलूस में होते, इधर कैसे ? अंडरकवर रिपोर्टर ने कहा की नहीं, हम तो ऐसे ही घूमने चले आये हैं ? आप तो यहीं के हैं, क्या चाहते हैं क्या बने, कुछ बने की वैसे ही रहे ? जैन साहब ने लड़के को आदेश दिया की और समोसे न निकाले क्योंकि बज़ार में सन्नाटा है, फिर आकर बगल में बैठ गए और बोले – हम क्या कहें, देश में माईनारिटी का सुनता कौन है ? सब जोर जबरदस्ती, हल्ला हँगामा करने वालों की ही सुनते हैं। मार्क – मतलब आप चाहते हैं की मस्जिद बन जाए ? जैन साहब – क्यों हम मस्जिद चाहेंगे ? मार्क --तो खुदाई में नीचे मंदिर के अवशेष मिले हैं, और करोड़ो लोगों की आस्था का सवाल है इसलिए मंदिर ही …जैन साहब — और उसके नीचे बुद्ध काल के अवशेष मिले हैं,साफ़ है की बुद्ध कालीन इमारत के ऊपर मंदिर बना था, उसका क्या करेंगे ? आप लोग जो चाहेंगे वही होगा ? करिए , देश आपका है। वो तो नीचे की बात है, ऊपर देखना हो तो मणि पर्वत और सुग्रीव पर्वत देखिएगा, दोनों अशोक के ज़माने का बौद्ध स्तूप था, सुग्रीव पर्वत में तो बकायदे बौद्ध विहार का अवशेष मिला था। सब हिन्दुओं ने कब्ज़ा कर लिया, यही है आपका धर्म, कमजोर, अहिंसक लोगों की प्रापर्टी कब्ज़ा कर लो ? जय राम जी की, पैसा दीजिये , आगे बढ़िए महराज। पूछ रहे हैं क्या बनेगा !

मार्क खुद को संयत करते हुए बोले — दादा जी, आप से क्या मतलब, कुछ भी बने, आप तो जैन लोग हैं, अयोध्या के झगड़े से आपका क्या लेना देना ? जैन साहब भारी मन से बोले — बेटा, अयोध्या हमारे लिए क्या है, ये तुम क्या जानो ? हमारे पाँच तीर्थंकर यहीं अवतार लिए थे, आपके तो खाली रामजी न लेकिन हमारे पहले से लेकर चौदहवें तक, कुल पाँच। हमारे आगम में लिखा है की शिखरजी और अयोध्या जी , यही दो नगर हैं जो कभी भी समाप्त नहीं होंगे, अमर नगरी है ये। अब उन्होंने तौलिये से पसीना या आंसू पोछते हुए कहा — भगा दिया हिन्दुओं ने हम लोगों को अजुधिया से, कहीं भी जैन समाज में पञ्च कल्याणक होता है तो पहले वहाँ अजुधिया नगरी का निर्माण होता है। लेकिन क्या किया जाय ले देकर दुनिया भर में चालीस लाख जैनी होंगे, उनमें भी कई पंथ, इतनी ताकत ही नहीं की अजुधिया में कारसेवा किया जाय, न तो इतना वोट है की रामकोट के झगड़े में पार्टी बन जाएँ की पुराने हम और बौद्ध बन्धु है, पहिले उनका फैसला करो फिर मंदिर -मस्जिद बनवाओ।

मार्क को दादा ने इमोशनल बना दिया, धर्मनिरपेक्ष देश के इन अल्पसंख्यकों का दर्द उसके अन्दर तक घुस गया। उसने भी पसीना पोंछा और पैसे चुका कर निकलने लगा तो दादा ने कुछ गलियाँ बताईं जहाँ से हनुमानगढ़ी जल्दी पहुँचा जा सकता था। चारो तरफ छोटे -बड़े मंदिर, गेट और दीवारों पर लिखीं चौपाईयों से ये भी डूबने -उतराते हुए चलते रहे। एक दुकान के सामने कुछ भीड़ लगी थी, ये भी घुस गए जहाँ एक दाढ़ी वाले सज्जन, जो मुसलमान ही थे , को कुछ लोग घेरे हुए थे। शायद किसी सौदे पर बहस हो रही थी, एक बोला – फन्ने मियाँ, हम कहाँ से रक्षा और माला, चटाई का पूरा पैसा दें, कह रहे हैं और तुमको पता भी है की धंधा ठीक नहीं चल रहा है, थोड़ा रेट सही कर दीजिये। फन्ने मियाँ – हमारा खानदान आपको ही सप्लाई देता रहा है, किसी और के ठीहे पर जाते नहीं, महँगाई बढ़ गई है, कुछ ख्याल करिए जनाब। दुकानदार – तो अपने मोलायम से कह के काहें नहीं मंदिर बनवा देते, अमन चैन अजुधिया में भी वापस आ जाय। फन्ने मियाँ – तुम्हरे बाप अउर दद्दा कभी गए रहे उहाँ पूजा करे की तू जैबो रामकोट ? दुकानदार – चचा , तोरे अब्बू कभी नमाज़ पढ़ें हैं का ऊ फसादी मज्जिद में? तीसरा – भाई करोड़ो लोगों का मामला है और कमाल है की अजुधिया वालों से साले पूछते ही नहीं। फिर गालियों का दौर चला, लखनऊ, दिल्ली गरिया के सौदा पटना ही था फन्ने मियाँ भी चल दिए और मार्क भी मुस्कुराते हुए बढे। मार्क ने अब तक अयोध्या में कई बार रामकोट शब्द सुने थे, उन्होंने फन्ने मियाँ से पूछा की चचा रामकोट किधर है तो चचा ने कहा वही जिसके चक्कर में सब धंधा पानी चौपट हुआ जा रहा है, जहाँ मस्जिद शहीद हुई उही जगह को अजोधिया में रामकोट कहे हैं। फन्ने मियाँ से हनुमानगढ़ी का रास्ता पूछ आगे बढे मार्क, सूनी सड़क को पार करके फिर दूसरी गली में घुसना था।

गलियों में थोड़ी बहुत चहल -पहल दिखती थी, कुछ दूर कनक भवन का बोर्ड दिखने लगा, जैन साहब के यहाँ कुछ देर बैठने से पैर ठीक थे और दिमाग भी साथ दे रहा था। सोचे पहले हनुमानगढ़ी ही चलेंगे उसके बाद जन्मभूमि, कुछ देर बाद ये हनुमानगढ़ी के नजदीक आगये, सामने सीढियाँ थीं जिनसे ऊपर जाना था। इतनी मेहनत के बाद यहाँ तक पहुँचे, सोचा की पाव भर लड्डू हनुमान जी को चढ़ा कर पानी पिया जाय। लड्डू लेने पहुँचे तो दुकानदार ने बहुत इज्ज़त से जयराम जी की किया और पूछा की नई पोस्टिंग पर आये हैं का साहेब ? मार्क – कैसी पोस्टिंग भाई ? मैं तो दर्शन करने आया हूँ। दुकानदार – साहब हम समझे की पुलिस में हैं, ट्रांसफर में अजुधिया आये है, का है की यात्री लोग का तो आना बंद है, पुलिसे वाले नए नए आते हैं तो बजरंगबलि को परसाद चढ़ाते हैं, रोज़ रोज़ फिर वो भी बिना परसाद के दर्शन करते हैं, कहाँ से चढ़ाएंगे, इहाँ कमाई -धमाई त किछु है न, न सब वर्दी वाले दरोगा जी ही होत हैं की …। इस बिचारे का दर्द महसूस करते हुए मार्क ने एक एक पाव के दो जगह बंधवा लिए और सीढियाँ चढ़ने लगे, सोचा की एक डब्बे का खुद खायेंगे और दूसरा घर ले जायेंगे, ऊपर तक पहुँच चुके थे तभी कहीं से अचानक एक मोटा बन्दर रेलिंग पर से कूदा और इनके कुछ समझने के पहले ही प्रसाद के एक डिब्बे का मोचन करके दूसरी तरफ की रेलिंग पार कर गया। ऊपर मंदिर की देहरी पर उपस्थित पुजारी ने कहा --चढ़ गया,चढ़ गया, चिंता मत करिए साक्षात् उन्ही के पास गया। खैर ये मंदिर पहुँच गए और पुजारी जी को बोले – महराज एक डब्बा बचा है और उनके हाथों में पकड़ा दिए, जब तक ये हनुमान चालीसा का पाठ करते तब तक पुजारी ने तुलसी दल डाल कर प्रसाद वापस कर दिया। ये वहीं सीढियों पर ही दनादन लड्डू मुँह में डालने लगे तो पुजारी ने सलाह दी कि आराम से अगल -बगल देखते हुए नीचे उतर जाईये, इन वानरों को भी सीढियों पर कुछ मिल नहीं रहा है, नहीं तो यात्री आते हैं तो दोनों तरफ इनको खुले हाथ खिलाते रहते हैं।

सावधानी से उतरते हुए गली में आगये मार्क, सामने चाय की दुकान थी, सोचा चाय के बहाने थोड़ा सुस्ता लेंगे। बैठ गए बेंच पर, साथ ही चार - पाँच लोग और बैठे थे, किसी भी चाय की दुकान की तरह यहाँ भी देश की समस्याएं सुलझाई जा रही थीं। चाय की गिलास हाथ में पकड़ते हुए इन्होने पूछा – भाई साहेब ये मंदिर क ब का है ? और जब जन्मभूमि पर हमला हुआ तो ये सुरक्षित था ? एक तिलकधारी ने कहा – बजरंगबलि का मंदिर कौन छू सकता है ? काहें नहीं सुरक्षित था, इके का होगा ? दूसरे ने कहा – भईया इ मंदिल अवध के नबाब बनवाये रहें, उन्ही की इज्ज़त में रमजान के टाईम इहाँ अफ्तार भी कराया जाता है। पहले वाले सज्जन ने कहा – ऐसा नहीं है, नवाब के एक कारिंदे रहे पंडीजी, उन्ही को नवाब साहब ने अजुधिया दे दिया था, उस ज़माने में टीले पर छोटा मंदिर था, बजरंगबलि की कृपा से नवाब साहब को औलाद भई तो उन्होंने पंडीजी से कहा की जेतना भव्य बना सकते हो मंदिर बनाओ, हम खजाना खोल देंगे। तो आप ये समझिये की मंदिर हनुमान जी की कृपा से ही बना है फिर कौन तोड़ेगा ? एक दूसरे सज्जन ने कहा इ सब झूठ बोल रहे हैं, मंदिल सतजुग के ज़माने से है, इ ज़माने में इतना जगता मंदिल कौन बनवा सकता है। सत्संग चलता देख बगल में पोथी पत्रा की दुकान वाले सज्जन भी आकर बैठ गए और बोले की भईया कौन बनवाया था, जान कर का करेंगे आपकी श्रद्धा भक्ति है पूजा पाठ करिए, आगे बढ़िए। देखिए कौन बनवाया और कौन तोड़वाया के लफड़े में अजुधिया फँसी हुई है, कब तक फँसी रहेगी, राम जाने। वैसे आप करते क्या हैं ? मार्क ने बताया की पत्रकार हैं, दिल्ली से आए हैं। गलियाँ खाली थीं, यात्री नदारद थे, ऐसे में चाय की दुकान पर सत्संग गति पकड़ने लगा। एक बुज़ुर्ग ने कहा – दिल्ली से आए हैं, रामकोट गए ? हिन्दू हैं, दर्शन किया ? मार्क – वहीं जाने की सोच रहे हैं, आप लोग तो बड़े भाग वाले हैं, रोज़ जाते होंगे ? बुज़ुर्ग – वहाँ ! पुराने ज़माने में जो इधर से भगाए जाते थे, वहीं टीले पर शरण पाते थे, हम लोग तो ई बवाल शुरू होने के बाद कभी कभार जाने लगे हैं, रोज़ जा कर क्या करेंगे ? मार्क – मतलब ? बुज़ुर्ग — भईया, तुलसीदास को अजुधिया के संतों -बाम्हनों ने अजुधिया जी में खदेड़ दिया, उनको लगता था की अभी जो कथा चौकी पर सुना कर दक्षिणा ले रहे हैं उसको तुलसिया सरल बोली में लिख रहा है, सब समझने लगेंगे तो चौकी कौन पूजेगा ? लेकिन तुलसी बाबा भी कहे की 'मांग के खईबो, मसीत में सोईबो ’ और घूम - घाम के रात बिताने उसी झाड़ झंखाड़ वाले रामकोट की मस्जिद में जाकर रात बिताते थे। तिस पर भी लोग अनेत कर दिए तो तुलसी बाबा काशी भग चले। दूसरे ने टोका – अरे बाबा के हीत, काहें पढ़ा रहे हो, मसीत से पहिले तो मंदिले था न रामकोट पर, ई अलग बात है की फसादी मसीत बना के तुरुक्कों ने वहाँ पूजा पाठ बंद करवा दिया था लेकिन न वहां कोई नमाज़ पढ़ता था न पुजारी जाते थे।

मार्क सत्संग में डूबने लगे – फिर वहाँ मूर्ति तो थी ही, पूजा क्यों बंद हो गई ? बुज़ुर्ग – भईया, छापोगे का ? अंग्रेजों के ज़माने में उधर जाने का सवाल ही नहीं, आज़ादी के तुरन्ते बाद एक रात एक जाने उहाँ मूर्ति धई दिए और सुबह हल्ला मचाए की सपने में रामलला बताये की परकट हो गए हैं, चलो सब कोई दर्शन कवा जाय। दस बीस आदमी की भीड़ गई, मचा बमचक, भए परकट किरपाला, दीन दयाला ! अब देखो ऊ जमीन केकर है इसका मुक़दमा अंग्रेजों के ज़माने से चल रहा है, एक पार्टी अंसारी लोग का था और दुसरा वहीं के एक अखाड़े का। परकट होने से शहर भर में हल्ला और इ दुनों पार्टी परेशान की जमिनिया कौनो तीसरा कब्जियाने के फेर में है। दोनों पार्टी मोहब्बत से मोकदमा लड़ती रही, एक्के ताँगे पर बैठ कर, साथे फैजाबाद की अदालत जाते रहे, बाद में एक्के जीप से भी जाते रहे, पईसा बचता रहा। तभी किसी ने टोका – लेकिन दद्दा मूर्ति वाला कांड में त गोरखनाथ के महंथ और नेहरू जी का हाथ रहा ? बुज़ुर्ग – अबे चोप्प, साला, देश में किछु भी गड़बड़ हो लप्प देने बोल दो की नेहरू का किया हुआ है।

एक साथ कई आवाज़ आई — लेकिन ताला तो राजीवे खोलवाए, उहो गोरखपुर वाले मुख्यमंत्री बीर बहादुर सिंग के समझाने पर, इस कांड में भी हिन्दू महासभा के गोरखपुर वाले महंथ जी का हाथ था। मार्क – लेकिन ताला तो साहबानो वाले फैसले की भरपाई में खुला ? बुज़ुर्ग – अपना फैसला रखो, ताला खुल गया, तब तक एक पार्टी और होगई रही मुकदमे में ‘रामलला विराजमान’, अउर ऊ चूँकि नाबालिक हैं तो उनकी तरफ से एक जने, कमाल है, अदालत ऊ भी मान लिहेस। लेकिन भईया, ताला खुलते ही एक्के इक्के से जाने वाले मुद्दई लोगों के हाथ से मोकदमा भी चला गया। अब सुन्नी वक्फ़ बोर्ड और दंगल पार्टी भी आ गया, और देखो उन सबकर जात्रा चालू हो गया, आगे त फिर देखी रहे हो का बताया जाय, अजुधिया की किस्मत बिगड़ गई। न तो , असली मुद्दई हाशिम मियाँ अभिये इधर से पान खा के गए हैं, उनके साथ उठने -बैठने में कोई दिक्कत नहीं है लेकिन बहरिया सब माहौल ख़राब कर दिया है।

मार्क गंभीर हो गए और सबको जयराम जी बोल आगे बढ़े। कुछ देर तक चलने के बाद जन्मभूमि का रास्ता पता किया और उस तरफ बढ़ चले,हनुमानगढ़ी के बंदरों से कहीं अधिक पुलिस फ़ोर्स वहाँ तैनात थी, अपना प्रेस कार्ड फिर गले में लटका लिए। वर्दी वालों से पूछा की कुछ खास बात है क्या तो एक सज्जन ने बताया की ये फ़ोर्स रेगुलर यहीं रहती है, खैर चेकिंग के बाद इनको आगे बढ़ने का मौका मिला। सामने एक चबूतरे पर टेंट तना हुआ दिख रहा था जो एक साईड में थोड़ा फटा भी था, सामने ही पहुँचने में बैरिकेडिंग में इतने घुमाव थे की लगा कब के चल रहे हैं। आने --जाने वालों में भी नंगे पैर नीली -खाकी वर्दी वाले ही थे, जो दर्शन के लिए आ -जा रहे थे, अपने आगे चल रहे एकअधेड़ सिपाही से पूछा की सरजी आप ही लोग दिन भर दर्शन करते हैं तो कोई मन्त्र पाठ कर रहे सिपाही ने पीछे मुड़ कर नहीं में गर्दन हिला दी। थोड़ी देर में मार्क उस मूर्ति के सामने थे, प्रणाम किया, छोटी सी मूर्ति, मार्क खो से गए, हे राम ; क्या हाल है यहाँ और पूरे देश में, देखते क्यों नहीं ? कुछ देर आँखे बंद। वहाँ भी पहरेदारी में लगे वर्दी वाले ने कहा – हो गया, बढिए, तो पुजारी जी ने टोक दिया – अरे तिवारी जी, मौका मिला है निहार लेने दीजिये, नहीं तो जब से चौरासी कोस का हल्ला मचा है कौन आ रहा है इधर। कुछ दोहा चौपाई पढ़ कर मार्क ने पुजारी से पूछा की ये एक तरफ फटा तम्बू बदलाता क्यों नहीं तो पुजारी ने बताया की अदालत को बता दिया गया है, उसी के निर्देश की बाट जोह रहे हैं, मिलते ही प्रशासन बदल देगा, वाटर प्रूफ ही लगता है लेकिन तम्बू तो तम्बू ही रहेगा न भईया, एक ओर से फटता है तो हवा चीरती जाती है । … जे राम जी की इच्छा !

न जाने क्यों रामकोट के अगल -बगल का दृश्य देख कर मार्क का दिल बोझिल हो गया, भारी मन से फिर लोहे की पाईपों से घिरे घूम घुमईय्या को पार करते हुए बाहर निकले, एक कुर्सी खाली पड़ी थी, बैठ गए। सिपाही ने कहा की यहाँ नहीं, आगे बढ़ो, तभी एक अफसर टाईप के वर्दी वाले ने कहा - देखते नहीं, प्रेस वाले हैं!.. और साहब देश का क्या हाल है ? देश को आप लोग क्या बता रहे हैं, अयोध्या में अमन चैन कायम है की नहीं ? सच सच बताइयेगा, हम लोग तो कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। … मारकंडे गुप्ता ने प्रेस कार्ड निकाल कर जेब में डाला और वहाँ से चल दिया उसी मठ की ओर जहाँ उनका बैग पड़ा था और भोले ने बताया था कि आजकल धर्मात्मा कम आ रहे हैं।