अजुधिया की कहानी


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अयोध्या यानि कुछ लोगों के मुताबिक यहाँ के लोगों की रूचि युद्ध में नहीं है लेकिन सैकड़ों सालों से यहाँ अनेकों अखाड़े विराजमान हैं, जिनमें पुराने जमाने में अच्छे खासे लठैत रखे जाते थे जो भगवान राम के नाम पर मंदिरों को मिली हजारों एकड़ जमीनों की देखभाल किया करते थे। समय के साथ काम धंधे बढ़ने लगे तो गाँव से भाग कर लठैती करने यहाँ आने के बजाय युवक दूसरे ठिकानों पर जाने लगे और मंदिरों की जमीनें भी भू-माफियाओं के हत्थे चढ़ने लगीं।

ट्रेन अयोध्या स्टेशन पर रुकी, चारो तरफ जितने बन्दर दिखे उससे अधिक पुलिस वाले भी थे, दोनों की वर्दी का रंग एक ही था।

फिर भी ये एक खुशहाल शहर रहा है, रामजी की दया से पोथी -पत्रा, चन्दन टीका से हिन्दुओं का और खड़ाऊँ बनाने और माला, कंठी, चटाई, आसानी बनाने के धंधों से मुसलमानों की रोज़ी रोटी चलती रही है। ये अपने आप में अनोखा शहर है जहाँ दोपहर को भोग के वक्त मंदिरों में किसी को भी छक कर भोजन मिल जाता रहा है, एकादशी और कोई अन्य व्रत है तो जम कर फलाहारी भी चलता रहा है। तमाम अ वर्ण, क वर्ण के लोग दूर -दूर से यहाँ आकार तीर्थ यात्रियों से मिले दान को संचित करते रहे हैं और मंदिरों में भोजन करके, बचत घर भेजते रहे हैं। लेकिन लग रहा है कि इस नगरी को रुक रुक कर कैकेयी का श्राप लग जाता है फिर भगवान उसको काटते हैं और नगर अपनी गति पकड़ने की कोशिश करता है। हरिशयनी एकादशी से देवोत्थान एकादशी तक भगवान विश्राम करते हैं और संतगण किसी एक स्थान पर बैठ कर चातुर्मास करते हैं, संतों के लिए विचरण निषिद्ध होता है, भजन कीर्तन और अध्ययन, धर्म विमर्श का मौका
मिलता है। ऐसे में जब एक विशेष यात्रा की तैयारी हो रही थी , गपागप समाचार के मार्कन्डे गुप्ता, जिन्हें लोग प्यार से मार्क तेली कहते हैं, अयोध्या का भ्रमण करने निकले, मंदिरों की दशा और स्थानीय लोगों से बात चीत के बाद उन्होंने एक विवरण तैयार किया, प्रस्तुत है मुख्य अंश—

लखनऊ में ही ट्रेन की तलाशी होने लगी, सिपाही पूछ रहा था की अयोध्या कौन -कौन उतरने वाला है ? अभी कुछ दिन वहाँ जाने लायक नहीं है, माहौल बहुत ख़राब है। चार -पाँच साधुओं का झुण्ड था जो बोल दिया की हम जा रहे हैं, सिपाही ने एक साधू का हाथ पकड़ा और बोला कि उतारो अपनी गठरी, चलो नीचे, अभी अयोध्या जाना मना है। दूसरे साधू --का हुआ, हम अपने मठ भी न जा सकें, कौनो तुरुक्का सरकार का फरमान है का ? एक दूसरे यात्री ने कहा की बाबा अभी वहाँ यादो जी और दंगल जी का चौरासी कोस परिकर्मा का प्रोगिराम चल रहा है इसीलिए कड़ाई है। साधू बोला – परिकर्मा त चैत में होत है, राम नवमी वाला टाईम माँ, और उहे पूरा करके समाज, तनी बिश्राम करत और फिर निकल पडत है बदरी केदार। हमहूँ लोग उहे करके पहाड़ निकले रहे फिर फँसी गयो बृष्टि माँ, बहुत बारिश है, सब बर्बाद हो गया, हम लोग की पुरानी कुटिया और तीन साधू भी बह गए। अभिये तक उहाँ सब पलस्तर, जोड़ाई करके, ठाकुर जी का बैठा के हम लोगन सोचा की अब भाग चला जाय, बहुत बरसत है, चौमासा अगिले बरस होई जैहन, अजुधिया जी में बिशराम कवा जाय। सिपाही बोला – मतलब आप लोग परिक्रमा में नहीं जायेंगे ? साधू – काहें जायेंगे ? तूम अभी बनारस चले जावोगे ? सिपाही – बाबा, हम लोग का ड्यूटी फिक्स होता है। साधू – तो हम लोग का भी फिक्से समझो भईया, धरम सब फिक्से कईके रखा है, कोउ न माने तो बात दूसर। सिपाही उतर गए, ट्रेन आगे बढ़ी, एक सज्जन बोल पड़े – का महराज जत्रा का भी सीजन होत है का ? उनकी दाढ़ी -टोपी देख एक गंभीर टाईप के साधू ने कहा – हज बारहों महींने होत है का ? मजाक न करो। दाढ़ी वाले ने कहा – क्षिमा करौ बाबा, सही कह्यो, बारहो महिन्ने नहीं होत है, दिन निश्चित है। इस वार्तालाप से मार्क को भी कुछ समझ में आने लगा था, उनको लगा की अभी देश भर में जिस यात्रा का हल्ला मचा हुआ है वो अयोध्या से बाहर ही होगा।

ट्रेन अयोध्या स्टेशन पर रुकी, चारो तरफ जितने बन्दर दिखे उससे अधिक पुलिस वाले भी थे, दोनों की वर्दी का रंग एक ही था, एक बन्दर झट मार्क तेली के पैर से लिपट गया। दिल्ली वाले मार्क की हवा ख़राब होने लगी, साथ ही उतरे साधू ने झोले से एक केला पकड़ाया तो बन्दर धन्यवाद की मुद्रा दिखाते हुए चला गया। साथ ही दो युवक भी उतरे, एक ने साधू से कहा – बाबा हम लोग तो परिक्रमा में आये हैं जरा ई पता देखो और बताओ रेक्सा वाला को कितना देना होगा, वहीं जुटान है। साधू ने पता देखा और बोला चौरासी कोस घूमने आया है, हरामी रेक्सा का भाड़ा पूछता है ? रेक्सा से परिकरमा करना है का ? जाओ दस मिनट पैदल का रस्ता है। एक युवक बड़बड़ाते हुए आगे बढ़ा — गरियाव मत बबवा, अपने जिले के प्रभारी हैं इसलिए आना मज़बूरी है न तो अम्मा तो गरियाई रही थीं की हमार मरल मुहं देखियो जो दंगल पार्टी में गयो। तभी बन्दर जी के बाद पुलिस वालों ने मार्क को घेर लिया – कहाँ जाना है ? मार्क ने प्रेस कार्ड दिखाया तो एक पुरनिया सिपाही बोला – जाईये साहब सब आप लोगों की ही माया है। साधू लोगों ने भी अपने मठ का परिचय पत्र और अयोध्या का वोटर कार्ड दिखाया तो जाने दिया गया नहीं तो प्लेटफार्म पर ही एक तरफ ढेर सारे साधू कोनियाए हुए थे जहाँ टीका चन्दन लगा कर, झकझक कुरता पैजामा पहने कुछ लोग केले बाँट रहे थे, एक खंचिया में पूरियाँ भी पड़ी हुई थीं, डकार की जगह ये बैठी संगत जय श्री राम और मोलायम सिंग मुर्दाबाद बोल रही थी। सुरक्षा में लगे सिपाही कभी कभार इसी संगत में से केले और पूरियाँ लेकर गल में पंगत लगाये बंदरों की तरफ उछाल दे रही थी जिस पर कुर्ते वाले भी मुस्कुरादेते थे और बंदरों में भी लंका दहन का जोश आ जाता था।

स्टेशन से बाहर आकर मार्क ने दोस्त साधुओं से पूछा की बाबा हम किधर जाएँ, केला देकर बन्दर से बचाने वाले साधू ने कहा की – जहाँ मन करे तहाँ जावो बाबा, साधू किसी को कपार पर लेकर नहीं घूमता, और साधुओं की स्पीड बढ़ गई, मार्क खड़े रह गए। तभी एक रिक्शे वाला आ पहुँचा – कहाँ जाबौ भईया ? कौन मोहल्ला ? मार्क – यार हम अयोध्या घूमने आये हैं, कहाँ जाना चाहिए ? रिक्शे वाला – सबसे पहिले तो सरजू जी में इसनान बनाना चहिये, टेम्पू से जल्दी चहुँप जायेंगे, उधर कोने पर लगा है। मार्क को लगा की ये चाहता तो किसी नजदीकी धर्मशाला वगैरह तक पहुँचा कर दो पैसे कमा लेता, ये बोले – नहीं हम तुम्हारे साथ चलेंगे, चलो, जितना टाईम लगे। रिक्शे वाला बोला – हम उत्ती दूर नहीं जा पाएंगे, कुछे देर बाद घर जाना है, नाती हुआ है, आज पंडीजी आयेंगे, कथा बैठानी है। रिक्शे वाले ने किसी दूसरे को आवाज़ लगायी – अरे सुन एक सवारी है तुम्हरे ओर की, ले जा, इसी बहाने दुपहरिया घर में रोटी खा लेना। दूसरा रिक्शा वाला आ गया, चलिए साहब किस घाट चलना है ? मार्क – यार किसी घाट लगा दो, लेकिन ये बताओ की सरजू नहाना जरुरी है ? रिक्शे वाला – का साहब लगता है पहली बार आये हैं, अजुधिया आये और सरजू न नहाए, ऐसा कैसे हो सकता है ? मार्क – तुम्हारा नाम क्या है? रिक्शेवाला – साहब तीरथ करने आए हैं ? मार्क – नहीं यार, बस यूँ ही घूमने आये हैं। रिक्शेवाला – इदरीस नाम है साहब, चलेंगे कि उतर जायेंगे ? मार्क – यार मियाँ, काहे शर्मिंदा करते हो ? तुम्हारे हिन्दू दोस्त ने मुझे तुम्हारे पास भेजा, हमको उससे भी जाहिल समझते हो ? इदरीस – साहब बुरा मत मानिएगा, पढ़े लिखे लोग अधिक जाहिल होते हैं, हम अनपढ़ लोग तो दो टाईम रोटी के लिए खटते हैं और फिर रात में तान के सो जाते है, फिर अगली सुबह वही …जाहिलपना का मौका ही नहीं मिलता साहब।