मालेगांव के संदर्भ में ये सवाल अनुत्तरित हैं जो आपको जरूर जानना चाहिए!


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आप हेमंत करकरे के संदर्भ में प्रज्ञा ठाकुर को चाहे जितना कोस लें, सवाल तो अनुत्तरित हैं ही। प्रज्ञा ने तो करकरे को कोसने के बाद अपना बयान वापस भी ले लिया और क्षमा याचना भी कर ली लेकिन सवाल तो पूछे ही जायेंगे, आज नहीं तो कल।

हेमंत करकरे दिग्विजय सिंह को किस हैसियत से जानकारियाँ शेयर करते थे? मध्य प्रदेश के मुख्य़मंत्री रहे दिग्विजय सिंह की पड़ोसी राज्य महाराष्ट्र के कैडर के आईपीएस करकरे से अक्सर बात क्यों हुआ करती थी? पहले कांग्रेसी नेता भगवा आतंकवाद शब्द का प्रयोग करते हैं, फिर करकरे प्रज्ञा ओर पुरोहित को गिरफ्तार करते हैं और फिर पाकिस्तान से कसाब कलावा बाँध कर मुंबई आतंक मचाने पहुँचता है - यह श्रृंखलाबद्ध घटनाएँ क्या इशारा करती हैं?

उस वक्त गृह मंत्रालय में अंडर सेक्रेटरी रहे श्री मणि की पुस्तक हिंदू टेरर में उठाये गये सवाल आज तक अनुत्तरित क्यों हैं? आपने इन सवालों पर कोई प्राइम टाइम देखा है क्या? इन सवालों पर कोई हम तो पूछेंगे कार्यक्रम हुआ है क्या?

मणि लिखते हैं कि मालेगाँव प्रकरण पर तत्कालीन गृह मंत्री पाटिल संदर्भों से असंबद्ध दिख रहे थे जबकि दिग्विजय सिंह सवाल पूछ रहे थे - किस हैसियत से? मालेगाँव प्रकरण में एक खास मजहब के लोगों के शामिल होने की जो सूचनाएँ थीं, उनसे दिग्विजय सिंह अप्रसन्न दिखे। और फिर एक प्रज्ञा और एक पुरोहित (साध्वी और सैन्य अफसर) को इस प्रकरण में शामिल किया जाता है और भगवा आतंकवाद का किस्सा गढ़ा जाता है।

प्रज्ञा के नाम की जिस मोटरसाइकिल के बमकांड में उपयोग होने की बात हड़बड़ी में विवेचना में शामिल की गयी, उसका किस्सा बाद में कुछ और निकला। पुरोहित बरी किये गये और 10 साल तक यातनाएँ झेलने के बाद वापस सेना में सेवारत किये गये। स्पष्ट है कि सबूतों में दम नहीं था, वे सबूत जिनके आधार पर करकरे ने विवेचना की थी और भगवा आतंक शब्दावली गढ़ी गयी थी।

इन सवालों के संतोषजनक और विश्वसनीय जवाब चाहिए। हो-हो-हो-हो करके किसी को चुप करा देने से सवाल खत्म नहीं होंगे। आप वोटबैंक की राजनीति के लिए एक महान और प्राचीन सभ्यता को बदनाम करने की साजिश रचेंगे और चाहेंगे कि हिंदुस्तान खामोश रहे? यह नहीं चलेगा।

संदीप तिवारी के फेसबुक वॉल से साभार