बनारस फिर से अच्छा लगने लगा है


#1

Modi

घाट की तरफ जाने वालों को टीका चंदन मार के और तेल फुलेल वाला मेकअप करने की जरुरत नहीं है क्योंकि टीवी कैमरे वापस जा चुके हैं। वोटिंग के दिन की रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकार भी रात होते होते निकल लिए, प्रशासन के आदेश के बावजूद भी कोने अंतरे में रुके कुछ दलों के रणनीतिकार भी वापस दिल्ली पहुँचने की घोषणा करते देखे गए।

सब लोगों ने बनारस को थैंक्यू कहा है लेकिन बनारस सबको थैंक्यू बोल रहा है। पिछली जुलाई अगस्त में गपागप पर एक रिपोर्ट आई थी मोदिया लड़ी बनारस से, अब जब मोदी जी लड़ चुके हैं तब शहर में माहौल कैसा है और क्या सोच रहे हैं शहर के लोग इस बारे में गपागप समाचार सेवा के मार्कंडेय गुप्ता उर्फ़ मार्क तेली ने निकलते निकलते पिछले कुछ दिनों का ब्यौरा तैयार किया है जो बस यहीं के लोगों के बीच से लिया गया है और पूरी सावधानी बरती गयी है की बात जस की तस बताई जाए।

मार्क सूर्योदय की कुछ तस्वीरों को कैद करने के लिए खिड़किया घाट पर बैठ कर पूरब दिशा की तरफ निहार रहे थे क्योंकि उनको पता था की सूर्य पूरब से निकलता है तभी गमछा पहने दो सज्जन मंजन करते हुए उधर आये। एक ने पूछा – का हो घरे जाए क टिकस नहीं मिला का? पत्तरकार हो की घूमने आये हो?
दूसरे ने टोकते हुए कहा – छोड़ मरदे लल्लन, कवनो है चुपचाप है, जाने देवो।

मार्क – क्यों भाई आपलोगों को पत्रकारों से कोई नाराजगी है क्या? पूरे देश दुनिया में बनारस की चर्चा होती रही, न जाने कितने पत्रकार यहाँ टिके रहे और गली गली की एक एक खबर फैलाते रहे। दुनिया में बनारस का बड़ा नाम हुआ इस बार।

लल्लन – सही कहे गुरु, आप लोगों के बिना तो कोई जानता भी नहीं की बनारस भी कवनो शहर है, है न? आप लोगों ने तो अइसा-अइसा बनारस देखा दिया जे खुद बनारसी लोग नहीं देखे रहे होंगे। भोले नाथ की नगरी आप ही लोगों के भरोसे ही अब दुनिया में फेमस होय गयी, बड़ा एहसान किये तुम लोग। अरे मन तो कर रहा है की अकेले में मिल गए हो, उठा के हुमँच दे हियाँ अउर बतायें की केतना गंध मचा कर रख दिया तुम्हारी बिरादरी ने।

तभी कुछ दूर पर बैठे एक बुजुर्ग ने आवाज़ लगायी – अरे लल्लन काहें एक आदमी को परेशान कर रहे हो, वो बेचारा चुपचाप बैठा है, बइठने दो।

लल्लन – का हो मुमताज़ चच्चा, नमाज पढ़ी आये तो हमहीं पर फ़तवा मार रहे हो? का हुआ रहा, अजय राय पर गए रहे की केजरीवाल पर? देखो हियाँ तो सब सरकार बनाय लिए हैं।

मार्क – उनका नाम मुमताज़ कैसे हो सकता है? ये तो औरतों का नाम होता है, शाहजहाँ की बीवी का नाम मुमताज़ था?

लल्लन – कवन शाहजहाँ? हम त बचपने से जानते हैं की ओनका नाम मुमताज़ है, का हो चच्चा ई कह रहा है की तोरा नाम जनानियों वाला है।

मुमताज़ – कहे दो भाई, कोई पर रोक थोड़े न है, अइसा लोग ही त बनारस क कवनो गंगा-जमनी तहजीब क बात रोज़ टीवी पर बताते रहे हैं। दोष इनका हइय्ये नहीं।

लल्लन – हाँ हाँ, अरे ऊ मौलाना का कहते हैं की अल्ली बे ते से पढ़बे नहीं किये अउर चले हैं फ़ातिहा पढ़ने। लेकिन ई नहीं बताये की तुम लोग काँग्रेस को काहें धोखा दिए? करेजीवाल त दिल्ली भग गया, हियाँ रहेंगे त अजय राय न?

मुमताज़ – देखो जो लड़ता हुआ दिखे उसके साथ रहना चाहिए, दम दिखाया है केजरीवाल ने बाकी तोरे नेताजी द पहिले ही दण्डवत मार दिए रहें। लड़ाई में रहना जरुरी है बस इस वास्ते हम केजरीवाल के साथ रहे, अब ऊ चाहे दिल्ली रहें चाहे कतहूँ और।

लल्लन – अरे नेताजी को का कहें? बेटवा को भेजेन भी त परचार के अंतिम दिना पर अउर उहो लगा की बस नाक बचावे खातिर आये रहें काहें से की फिर बिधानसभा भी लड़ना पड़ेगा। शहर में का कह के ओट माँगते, अगली दान। हमरे घरवा वाले त सब मोदिया के ही दिए हैं, सब कह रहे हैं की परधानमंत्री बन जइहें त शहर का बिकास होगा।

मुमताज़ – मने अब तुम लोगन को दूध में पानी मिलाने का जरुरत नहीं पड़ेगा? भइंसिया खुदे पानी मिला के देगी? लल्लन – अब मज़ाक न करो, तुमरी बिरादरी में भी कुछ तो अइसे हैं जो कमल दबाये होंगे। है की नाहीं?

मुमताज़ – सवाले नहीं है, दोषीपूरा के हज़ार-दुई हज़ार जरुर गए होंगे जे पहिले से साथे थे, उसमें नया क्या है?

मार्क – मतलब उस इलाके में शिया रहते हैं?

मुमताज़ – तुम अपना काम करो जी, देखो सुरुज नारायण निकल रहे हैं, फोटो घिंचो।

लल्लन – लेकिन चच्चा, राहुल गाँधी को पहिले आना चाहिए था। देखा नहीं की केतना जबरदस्त मजमा रहा। हमके त याद नहीं है की कभी कांग्रेसिये शहर में एतना भीड़ जुटाए रहे होयें।

मुमताज़ – मरदे, भीड़ क कवनो मतलब नाहीं होत है। हम खुदे बहुत मिला को जानते हैं जो कुल पार्टी का टोपी एह बीच पहिन चुके हैं। अउर देखे नाहीं की जब राहुल गाँधी क जुलुस लहुराबीर से आगे बढ़ा त दस मिनट के भित्तर काँग्रेस क झंडा साफ़ होई गवा अउर मजूर सब सपाई झंडी ताने में लग गए रहे।

लल्लन – लेकिन एक बात त है की जेतना मजदूरा सब मोदी जी ने जुटाया था ओतने कवनो पार्टी से नहीं आये रहे। लगता रहा की पूरा बिहार अउर गुजरात बनारसे में पलट गया है।

मुमताज़ – हाँ यार, यही बात त हमको भी नहीं समझ में आया की जब एतना तगड़ा लहर चला रहा त का जरुरत रही? वइसे एक बात बतायें अरविंद के साथे बाहरी सब न आते तो हियाँ बड़ी मुश्किल थी, सब आदमी कहने में डरता था की मोदी को वोट नहीं देंगे। अरविंद ने आके जान फूंक दी और थक हार के कंग्रेसिया सब एकदम अंतिम में अजय राय को खड़ा किये। सपाई सब का त पहिले से ही लगता रहा की मोदी जी के पार्टी से सेटिंग हुई गवा है। एह से हम लोगन को लगा की केजरीवाल लड़ने आया है, उसी के साथ रहो।

लल्लन – हाँ चच्चा, गाँव देहात में भी बड़ी चर्चा रही। अउर हम त कहेंगे की देहात में खाली अरबिंदे लड़ा हैं, काहें से की बकिया त हल्ला मोदी-मोदी होता रहा है। गाँव-देहात के गरीब गुरबा को लगा है की आजकल के जमाना में भी कवनो है जो इन सबसे लड़ सकता है। तभी बगल में बैठे एक सज्जन बोले – अरविंद फ्राड है, धोखा दे दिया उन सबको जिसने भी उसको वोट दिया। देखा नहीं कइसे कह रहा था की उसके जेबा में खाली 500 रुपल्ली है अउर इहाँ शहर में हज़ार रुपया रोज़ पर खटने के लिए सुना है दस हज़ार आदमी जुटाया था। कहाँ से आया पइसा।

मुमताज़ – अरे तेवारी, तुम तो मत बोलो तो ठीक है। मोदी जी त चाय बेंच के अउर राहुल गाँधी अपनी अम्मी से उधार लेकर हवाई जहाज उड़ाते रहे न? बहुत लोग हैं जो सेवा भाव से लगते हैं, सब तोरे जइसा नहीं होता की सबका हिस्सा भी मार ले। हमको पता है की तुमको केतना पइसा मिला रहा, केतने ओट का ठेका लिए थे?

तेवारी – अरे चच्चा, का बात कर रहे हो? तनी पता कर लेवो की अबकी चुनाव कइसे हुआ है? ऑफिस में भी गुजराती सबका कब्ज़ा रहा, उधर देखो किनारे एक पोस्टर पड़ा है, उठाय लेओ। नीचे गुजराती में छपा होगा की अहमदाबाद के किस प्रेस का है। हमहूँ सुन ही रहे हैं अउर देख रहे हैं की खूब पइसा उड़ा है, उड़ा जरुर है लेकिन अबकी तरीका बदल गवा है। पहिले चुनाव के बखत कभी शिशुमंदिर के बच्चा लोगन को कह दिया जाता था की घर से दू आदमी के खाना का पैकेट तइयार करके लेते आना। अबकी त सबको एसी वाला होटल का जरुरत था।

मुमताज़ – अरे बडकू बताय रहे थे की शहर में अबकी दारु का धन्धा भी बम्पर चला है, रेकार्ड तोड़ बोतल खुली है।

तेवारी – पता नहीं, अउर पार्टी का हमको नहीं पता। हाँ बियर-उअर सँझा को कभी कभार चलती रही है, गर्मी बहुत रही है न। ओतना तो चलता है।

मार्क – हाँ, खबर थी झाड़ू पार्टी के कुछ लोगों ने घाट पर बियर पी कर गंगा जी में पेशाब कर दिया था जिससे उनकी पिटाई हुई?

लल्लन – तुम अपना फोटो उतारो न भाई? ई गँगा को साफ़ करने का जो सब डिरामा करते हैं त काहे लिए? पब्लिक गँगा जी में गुलाब जल बहा रही है का, गँगा जी में गुलाब जल बढ़ गया है, उसको साफ़ करना पड़ेगा? सब घाट पर इहें हगते मूतते रहते हैं, न तो शहर का सब कचड़ा गँगा जी में ही त जा रहा है। ऊ केजरीवाल का चाल रहा होगा परचार का।

मुमताज़ – केजरीवाल को परचार की का जरुरत रही, ऊ सही में संत आदमी हैं। देखा नहीं की कइसे सबके बीच जाय के घुलते मिलते रहें? गाँव में पंगत में खाना खाय लेत रहें, कहूँ भी सोय जात रहें। भले हार जाएँ लेकिन शहर के बताय गयें की अबहूँ कुछ आदमी बचे हैं दुनिया में जो गरीब गुरबा के बीच में जाने से घबराते नहीं हैं की बीमार पड़ जायेंगे।

तेवारी – अरे तुमको मालूम है हमेशा हमारे संगठन के कुछ लोग भी ओनपर नज़र रखते रहे की कवनो मारे मत न तो हल्ला हो जाता की भजपईया मारे हैं। आते ही बदनाम कर दिए सब बनारस को, देखो हम लोग नज़र रखने लगे तब से कहाँ पिटाये? न तो दिल्लिये से बोल के चले थे की बनारस में उनको खतरा है।

मुमताज़ – जाने देवो तेवारी, सफाई मत देवो न तो हमहूँ को कुछ कहना पड़ जाएगा त तुमको अच्छा नहीं लगेगा। चलो कुल्ला करो, नहाया जाय।

मार्क – आप लोग रोज़ यहाँ आते हैं?

लल्लन – काहें नहीं आयेंगे? का परचार करने आये थे का की एक दिन आगये फिर भाग जायेंगे?

मुमताज़ – अबे आये तो मोदियो जी नहीं जे कहते रहे की गँगा माँ ने बोलाया है। का घाट आने अउर जल छिड़कने वास्ते भी परमीशन लेना पड़े है? परचार के टाइम मौका नहीं मिला फिर परधानमंत्री बन जइहें त का रोज़ गँगा नहाए अइहें?

तेवारी --चलो चच्चा, नहाया जाय…अरे भाई हम लोग रोज़ आते हैं, जब तक हो मौका मिले त आते रहना अउर हाँ कल गमछा लेकर आना। बिना गँगा नहाए चले जाओगे बनारस से ?


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