चीन द्वारा जारी इस नक्शे के क्या मायने हैं?


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भारत के इस चुनावी वातावरण में जनता व मीडिया जहां, वाराणसी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के रोड शो, प्रियंका वाड्रा द्वारा अंतिम समय पर वाराणसी से चुनाव न लड़ना और मोदी सुनामी के आगे विपक्ष के अवसाद को लेकर जब व्यस्त है तब सदूर बीजिंग, चीन में एक ऐसी घटना घट चुकी है, जो 2019 में मोदी जी के दोबारा प्रधानमंत्री बनने के बाद, अप्रत्याशित घटनाओं को जन्म देने वाली है।

कल बीजिंग में बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के दूसरे समिट की तीन दिवसीय बैठक थी, जिसमे निमंत्रित किये जाने के बाद भी लगातार दूसरी बार, भारत ने इस समिट का बहिष्कार किया है। चीन के राष्ट्रपति शी, की इस अतिमहत्वकांशी परियोजना बीआरआई का उद्देश्य, चीन को राजमार्गों, रेल लाइनों, बंदरगाहों और सी-लेन के नेटवर्क के माध्यम से एशिया, अफ्रीका और यूरोप को जोड़ना है। इस पूरी परियोजना में चीन के लिए भारत एक महत्वपूर्ण धुरी है और उसकी प्रथमिकता है कि भारत इसका हिस्सा बने, क्योंकि बिना भारत की सहभागी हुये, चीन अपनी इस बीआरआई परियोजना के लक्ष्यों को नही प्राप्त कर सकता है।

भारत के महत्व को इससे समझा जासकता है कि भारत इस समिट का बहिष्कार करता रहा है, उसके बाद भी चीन ने जो बीआरआई का मानचित्र प्रदर्शित किया है, उसमे भारत को भी दिखाया गया है। यहां यह बता दूं कि भारत और चीन के सम्बन्धो में मानचित्रों का बड़ा महत्व है।

विश्व मे कूटनीति में नक्शो का बहुत महत्व होता है और जब कोई राष्ट्र, किसी राष्ट्र के नक्शे को पूरी तरह से नही स्वीकारता है तो उसका अर्थ यह होता है कि वह राष्ट्र, दूसरे राष्ट्र के जिन हिस्सो को लेकर आपत्ति कर रहा है, उसको या तो विवादित मानता है या फिर उस हिस्से पर अपना अधिकार समझता है।

भारत मे यह बहुत कम लोगो को इस बात का ज्ञान होगा कि भारत और चीन के बीच के विवाद की जड़ यही मानचित्र है। जब से भारत 1947 मे स्वतंत्र हुआ और चीन में 1948 में माओ की वामपंथी सरकार आयी है तभी से चीन ने, अंग्रेज़ो द्वारा खिंची गयी भारत की अंतराष्ट्रीय सीमाओं को स्वीकार नही किया है। वह हमेशा से अपने पुराने चीन के मानचित्रों में दिखाए गए सीमा क्षेत्रो को अपना मानता रहा है। इसी को लेकर भारत चीन युद्ध भी हुआ था और उस युद्ध मे भारत लगभग 3 लाख किलोमीटर की भूमि गंवा बैठा था। वह युद्ध अमेरिका के बीच मे अनजाने कारण रुक जरूर गया था लेकिन चीन में लद्दाख व अरुणाचल प्रदेश पे अपने दावे को कभी भी नही छोड़ा था।

इतना ही सिर्फ नही, 1963 में जब चीन ने पाकिस्तान के साथ अपनी सीमाओं को लेकर विवाद पर समझौता किया था तब, पाकिस्तान ने चीन की कुछ भूमि लेकर, जम्मू कश्मीर के कुछ उस हिस्से को दे दिया था जो, उसने 1947 में स्वतंत्रता के बाद अवैध रूप से कब्ज़ा किया था। इस सबके बाद भी चीन ने अरुणांचल प्रदेश व पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर को कभी भी भारत का हिस्सा नही माना। चीन अपने मानचित्रों में अरुणाचल प्रदेश को चीन का हिस्सा व पाक अधिकृत जम्मू कश्मीर को पाकिस्तान का हिस्सा दिखाता है।

इसी पृष्ठभूमि में जो कल बेजिंग जो घटना हुई है उसका सीधा सम्बंध इस सबसे व भारत के प्रधानमंत्री मोदी जी की कूटनीति व विदेशनीति से है। कल चीन के वाणिज्य मंत्रालय ने जो सभी आमंत्रित राष्ट्रों को बीआरआई का मानचित्र पेश किया है उसमे सम्पूर्ण भारत का मानचित्र दिखाया है। चीन ने पहली बार अरुणाचल प्रदेश व सम्पूर्ण जम्मू कश्मीर को भारत के हिस्से के रूप में दिखाया है।

1948 के बाद पहली बार है कि चीन ने भारत की उसकी सीमाओं और संप्रभुता को स्वीकारा है। चीन की पूरी विदेश नीति, संकेतो की कूटनीति पर आधारित होती है इसलिए चीन द्वारा मानचित्रों में पहली बार सम्पूर्ण भारत को दिखाया है जो यह निश्चित रूप से भारत की सबसे बड़ी कूटनैतिक विजय है। और चीन द्वारा दिये गये इस संकेत का पूरा श्रेय भारत की मोदी सरकार की नीतियों व स्वयं मोदी जी को है।

मैं देख रहा हूँ कि भारत चीन सम्बन्धो पर दृष्टि रखने वाले कुछ लोग पूरे जम्मू और कश्मीर और अरुणाचल प्रदेश को मानचित्र में भारत में शामिल करने के चीनी कदम से हैरान है। लेकिन मैं बिल्कुल भी हैरान नही हूँ क्योंकि मेरा अनुभव यह है कि चीन को जब अपनी स्टिक एंड कैरेट नीति असफल होती दिखती है तो हमेशा, संकेत देता है कि कुछ लेने और कुछ देने का रास्ता खुला रहे। चीन ने 1948 से नेहरू को बता रक्खा था कि उपनवेशवादी ब्रिटिश सम्राज्य द्वारा खींची गई सीमाओं को वह नही मानता है लेकिन नेहरू किसी और रोमानियत में जी रहे थे। वे हमेशा विश्व शांति, पंचशील और हिंदी चीनी भाई के नारों में वास्तविकता को नकारते रहे और उसी का परिणाम 1962 में एक शर्मनाक हार मिली थी।

यह आज का सत्य है कि 1948 के बाद के वामपंथी चीन ने पहली बार, 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्र किये गए भारत की, ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा खिंची गयी सीमा रेखायों को मान दिया है।

तो फिर क्या हमे यह मान लेना चाहिए की भारत का चयन से सीमा विवाद समाप्त हो गया है? नही, यह बिल्कुल भी नही हुआ है। हुआ सिर्फ इतना है कि चीन ने, यह स्वीकार करते हुए की, जिस गांधी परिवार पर उसने इतना व्यय किया था, वह डूब गया है और 23 मई 2019 को और बलशाली होते हुए मोदी जी का पुनरागमन होगा, इसलिये मोदी के भारत को, सीमा विवाद को लेकर, चीन की लचकता को दिखा दिया है। चीन ने मोदी जी को संदेश भेजा है कि यदि बीआरआई में सहभागी बनता है तो चीन, सीमा विवाद को लेकर लचीला हो सकता है।

मानचित्र के द्वारा चीन ने जो समझौते की कूटनीति की है उसका मूल कारण, पाकिस्तान में बीआरआई के अंतर्गत हो रही, सिपेक परियोजना है। उसकी सफलता ही चीन के विश्व का नायकत्व करने व उसके राष्ट्रपति शी के भविष्य का निर्धारण करेगी।

यहां, सिपेक इस लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सिपेक में जो चीन से पाकिस्तान को जोड़ने वाली जो हाईवे बना है, वह उस जगह से गुजरती है जो 1963 में पाकिस्तान ने चीन को गिलगिट बाल्टिस्तान का हिस्सा दिया था, जिस पर पाकिस्तान का कोई वैधानिक अधिकार नही है। यहां यह बताना महत्वपूर्ण है कि भारत की सरकारों ने कभी भी इस को लेकर कोई चर्चा नही की थी, यह 2014 में बनी मोदी सरकार है, जिसने इसका न सिर्फ विरोध किया बल्कि आधिकारिक रूप से हर तीन महीने, अपना विरोध, चीन की सरकार को दर्ज कराती रही है।

यहां लोगो को यह जानकर आश्चर्य होगा कि चीन शुरू से ही, पाकिस्तान द्वारा दी गयी, गिलगिट बाल्टिस्तान के इस क्षेत्र की वैधानिकता को लेकर सशंकित था। 1963 में जब समझौता हुआ था, तब चीन ने उसमे यह लिखवा दिया था कि इस क्षेत्र पर किसका अधिकार है यह विवादित है, जब विवाद समाप्त हो जाएगा तब चीन इस क्षेत्र पर वैधानिक अधिकार पाये राष्ट्र से अलग से समझौता करेगा। मैं समझता हूँ कि इस सबका यह भी कारण है कि अभी कुछ महीनों पहले, पाकिस्तान की सर्वोच्च न्यायालय ने, गिलगिट बाल्टिस्तान को पाकिस्तान का संवैधानिक भाग मानने से इनकार कर दिया है। उसको विवादित हो माना है।

मेरी जितनी समझ है, उस आधार पर मेरा आंकलन है कि चीन, पाक अधिकृत जम्मू कश्मीर के उस भाग को, जो बीआरआई के अंतर्गत बन रहे, सिपेक की सुरक्षा व आर्थिक सर्वग्राह्यता के महत्वपूर्ण है, उस पर वैधानिक अधिकार पाने के लिए, शेष जम्मू कश्मीर को सहज रूप से भारत के अधिकार में आने के लिए विचार कर रहा है।

वैसे, वैश्विक राजनीति और कूटनीति हमेशा से पहेली रही है लेकिन चीन द्वारा पहली बार सम्पूर्ण जम्मू कश्मीर व अरुणाचल प्रदेश को भारत का ही हिस्सा मान कर, 37 राष्ट्रों के समक्ष प्रस्तुत करना, अकल्पनीय संभावना को जन्म दे गया है।

पुष्कर अवस्थी के फेसबुक वॉल से साभार